विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी 2026: 29 सितंबर को ही क्यों रखा जाएगा व्रत? जानें चंद्रोदय, पूजा विधि, नियम और महत्व

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी 2026: सितंबर 2026 की संकष्टी चतुर्थी को लेकर इस बार एक खास भ्रम हो सकता है।

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पंचांग के अनुसार कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 29 सितंबर 2026 की शाम लगभग 5:09 बजे शुरू होगी और 30 सितंबर को दोपहर लगभग 2:55 बजे समाप्त होगी।

ऐसे में स्वाभाविक सवाल है—

जब 30 सितंबर की सुबह भी चतुर्थी तिथि रहेगी, तो विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत 29 सितंबर को ही क्यों रखा जाएगा?

यही इस व्रत को समझने की सबसे महत्वपूर्ण बात है।

संकष्टी चतुर्थी की परंपरा में केवल सूर्योदय के समय चतुर्थी होना ही निर्णायक नहीं माना जाता, बल्कि चतुर्थी तिथि के दौरान चंद्रोदय का विशेष महत्व होता है।

29 सितंबर की शाम चतुर्थी शुरू होने के बाद उसी रात चंद्रमा का उदय होगा। उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में चंद्रोदय लगभग 7:30 से 7:45 बजे के आसपास रहेगा। उदाहरण के लिए अलीगढ़ में लगभग 7:42 PM और लखनऊ में करीब 7:32 PM चंद्रोदय दर्ज है। इसी वजह से संकष्टी का व्रत 29 सितंबर को माना जा रहा है।

दूसरी ओर 30 सितंबर को चतुर्थी लगभग 2:55 PM तक ही रहेगी, जबकि चंद्रोदय उसके काफी बाद होगा। इसीलिए संकष्टी व्रत के लिए 30 सितंबर नहीं चुना जाता।

इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे:

  • विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी 2026 कब है?
  • चतुर्थी तिथि कब शुरू और समाप्त होगी?
  • चंद्रोदय का समय क्या रहेगा?
  • चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत क्यों खोला जाता है?
  • विघ्नराज नाम का क्या अर्थ है?
  • पूजा कैसे करें?
  • कौन-सी सामग्री चाहिए?
  • गणेश जी को क्या भोग लगाएं?
  • व्रत में क्या खा सकते हैं?
  • किन गलतियों से बचें?
  • गणेश चतुर्थी और संकष्टी चतुर्थी में क्या अंतर है?
  • और यदि चंद्रमा बादलों के कारण दिखाई न दे तो क्या करें?

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी 2026 कब है?

साल 2026 में आश्विन कृष्ण पक्ष की विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी:

मंगलवार, 29 सितंबर 2026

को मानी जा रही है।

पंचांग के अनुसार:

चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 29 सितंबर 2026, लगभग 5:09 PM
चतुर्थी तिथि समाप्त: 30 सितंबर 2026, लगभग 2:55 PM

29 सितंबर की रात चतुर्थी तिथि के दौरान चंद्रोदय होने के कारण व्रत इसी दिन रखा जाता है।

यहां एक जरूरी बात याद रखें।

पंचांग का तिथि समय पूरे भारत में लगभग समान हो सकता है, लेकिन चंद्रोदय का समय शहर के अनुसार बदलता है।

इसलिए यदि आप व्रत कर रहे हैं तो अपने शहर का moonrise time अलग से जरूर जांचें।


29 सितंबर को ही संकष्टी व्रत क्यों?

यही इस पूरे लेख का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सामान्य तौर पर कई हिंदू व्रत और पर्वों में उदया तिथि यानी सूर्योदय के समय मौजूद तिथि को महत्व दिया जाता है।

लेकिन संकष्टी चतुर्थी की पूजा पद्धति में चंद्रमा का विशेष स्थान है।

परंपरा के अनुसार भक्त दिनभर व्रत रखते हैं, शाम को भगवान गणेश की पूजा करते हैं और फिर चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत पूर्ण करते हैं।

इसीलिए उस दिन को प्राथमिकता दी जाती है जब चतुर्थी तिथि के दौरान चंद्रोदय हो।

29 सितंबर को चतुर्थी शाम 5:09 बजे शुरू हो रही है और चंद्रमा इसके बाद ही उदय होगा।

30 सितंबर को भले ही सुबह और दोपहर तक चतुर्थी रहेगी, लेकिन चंद्रमा रात में तब निकलेगा जब चतुर्थी समाप्त हो चुकी होगी।

इसलिए व्रत 29 सितंबर को रखा जाना उपयुक्त माना जाता है।

यह नियम समझ लेने के बाद तारीख को लेकर confusion लगभग खत्म हो जाता है।


विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी क्या है?

हर हिंदू महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है।

यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित है।

“संकष्टी” शब्द का सामान्य अर्थ संकट या कठिनाई से मुक्ति से जोड़ा जाता है।

भगवान गणेश को:

  • विघ्नहर्ता
  • प्रथम पूज्य
  • बुद्धि के देवता
  • सिद्धि के दाता
  • मंगलकर्ता

के रूप में पूजा जाता है।

संकष्टी चतुर्थी की परंपरा में भक्त जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने, सही निर्णय लेने की बुद्धि, परिवार की सुख-शांति और मानसिक स्थिरता की कामना से गणपति की पूजा करते हैं।

हर महीने की संकष्टी चतुर्थी का भगवान गणेश के अलग स्वरूप या नाम से संबंध बताया जाता है।

आश्विन कृष्ण पक्ष की यह संकष्टी विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी कहलाती है।


विघ्नराज का अर्थ क्या है?

“विघ्न” का अर्थ है बाधा या रुकावट।

“राज” का अर्थ यहां श्रेष्ठ या अधिपति के रूप में समझा जा सकता है।

विघ्नराज भगवान गणेश का वह स्वरूप है जिन्हें बाधाओं पर नियंत्रण रखने और उन्हें दूर करने वाला माना जाता है।

धार्मिक मान्यता में गणपति केवल संकट आने पर याद किए जाने वाले देवता नहीं हैं।

उनकी पूजा किसी भी शुभ काम की शुरुआत में भी की जाती है।

इसके पीछे यह भाव है कि:

काम शुरू करने से पहले बुद्धि, धैर्य और सही दिशा की जरूरत है।

इसीलिए भगवान गणेश का आध्यात्मिक संदेश केवल “बाधा हटाना” नहीं बल्कि सही सोच विकसित करना भी माना जा सकता है।


विघ्नराज संकष्टी और गणेश चतुर्थी में क्या अंतर है?

यह दोनों पर्व भगवान गणेश से जुड़े हैं, लेकिन दोनों एक जैसे नहीं हैं।

गणेश चतुर्थी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी पर भगवान गणेश के जन्मोत्सव और गणेशोत्सव के रूप में मनाई जाती है।

वहीं संकष्टी चतुर्थी हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आती है।

गणेश चतुर्थी पर मुख्य रूप से:

  • गणपति स्थापना
  • उत्सव
  • कई दिनों की पूजा
  • सार्वजनिक पंडाल
  • विसर्जन

का महत्व रहता है।

जबकि संकष्टी चतुर्थी में:

  • उपवास
  • शाम की गणेश पूजा
  • चंद्र दर्शन
  • चंद्रमा को अर्घ्य
  • और उसके बाद व्रत खोलना

मुख्य परंपरा होती है।

अगर आप गणेश चतुर्थी 2026 की पूरी पूजा विधि, स्थापना और नियम पढ़ना चाहते हैं तो यह विस्तृत लेख भी देखें:

गणेश चतुर्थी 2026: तारीख, शुभ मुहूर्त, स्थापना विधि और पूजा नियम


29 सितंबर 2026 को चंद्रोदय कितने बजे होगा?

चंद्रमा का उदय पूरे भारत में एक ही समय पर नहीं होता।

भौगोलिक स्थिति के कारण शहर के अनुसार moonrise time बदलता है।

उदाहरण के रूप में:

लखनऊ: लगभग 7:32 PM
अलीगढ़: लगभग 7:42 PM
गाजियाबाद: लगभग 7:43 PM
मुजफ्फरनगर: लगभग 7:40 PM

दक्षिण भारत में चंद्रोदय इससे और देर से हो सकता है। उदाहरण के लिए हैदराबाद में लगभग 8:00 PM के आसपास चंद्रमा निकलने का समय दर्ज है।

इसलिए इंटरनेट पर किसी एक शहर का चंद्रोदय देखकर पूरे भारत के लिए उसी समय को सही न मानें।

जरूरी सलाह

अपने शहर के लिए उस दिन local Panchang या reliable moonrise calculator जरूर देखें।


संकष्टी चतुर्थी में चंद्रमा इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

संकष्टी व्रत का एक प्रमुख धार्मिक पहलू चंद्र दर्शन से जुड़ा है।

व्रती दिनभर भगवान गणेश का स्मरण करते हुए उपवास रखते हैं।

शाम की पूजा के बाद चंद्रमा के उदय की प्रतीक्षा की जाती है।

फिर परंपरा के अनुसार चंद्रमा को जल या अर्घ्य दिया जाता है।

इसके बाद गणेश जी की पूजा पूर्ण करके व्रत खोला जाता है।

यही कारण है कि इस व्रत की तारीख तय करने में चंद्रोदय महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इसी बिंदु पर इसे गणेश चतुर्थी के चंद्र दर्शन नियम से अलग समझना भी जरूरी है।

एक common confusion

बहुत से लोग जानते हैं कि गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा देखने से बचने की परंपरा है।

फिर सवाल उठता है—

यदि गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन से बचते हैं तो संकष्टी पर चंद्रमा क्यों देखते हैं?

दोनों की धार्मिक परंपराएं अलग हैं।

गणेश चतुर्थी के साथ चंद्र दर्शन से जुड़ी अलग पौराणिक कथा है, जबकि संकष्टी चतुर्थी में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण करने की परंपरा है।

इसीलिए दोनों को एक नियम से नहीं समझना चाहिए।


विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी पूजा सामग्री

बहुत महंगी सामग्री जरूरी नहीं है।

सामान्य रूप से आप रख सकते हैं:

  • भगवान गणेश की प्रतिमा या तस्वीर
  • साफ चौकी
  • लाल या पीला वस्त्र
  • रोली
  • अक्षत
  • चंदन
  • दूर्वा
  • फूल
  • दीपक
  • घी या तेल
  • धूप
  • कपूर
  • फल
  • मोदक या लड्डू
  • नारियल
  • सुपारी
  • मौली
  • जल का पात्र
  • चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए लोटा

पूजा सामग्री परिवार और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है।

सबसे महत्वपूर्ण श्रद्धा, स्वच्छता और सरलता है।


विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी की पूजा कैसे करें?

अब बात करते हैं सरल पूजा विधि की।

1. सुबह स्नान करें

सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।

मन में भगवान गणेश का स्मरण करें।


2. व्रत का संकल्प लें

अपने मन में संकल्प करें कि आप विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत श्रद्धा से करेंगे।

अपनी परंपरा के अनुसार निर्जला, फलाहार या सामान्य व्रत रखा जा सकता है।


3. पूजा स्थान साफ करें

गणेश जी की प्रतिमा या तस्वीर रखने के स्थान को साफ करें।

चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछा सकते हैं।


4. दीपक जलाएं

भगवान गणेश के सामने दीपक जलाएं।

धूप या अगरबत्ती भी जलाई जा सकती है।


5. गणेश जी का ध्यान करें

मन शांत करके भगवान गणेश का ध्यान करें।

सरल मंत्र:

ॐ गं गणपतये नमः

का श्रद्धापूर्वक जप किया जा सकता है।


6. रोली, अक्षत और फूल अर्पित करें

भगवान गणेश को रोली, चंदन, अक्षत और फूल चढ़ाएं।


7. दूर्वा अर्पित करें

गणेश पूजा में दूर्वा का विशेष महत्व माना जाता है।

स्वच्छ दूर्वा भगवान गणेश को अर्पित करें।


8. भोग लगाएं

मोदक और लड्डू गणेश जी के लोकप्रिय भोग हैं।

इसके अलावा फल और अन्य सात्विक प्रसाद भी चढ़ाया जा सकता है।

गणेश चतुर्थी पर राशि अनुसार गणपति को क्या चढ़ाया जाता है, इसे विस्तार से यहां पढ़ सकते हैं:

राशि अनुसार गणपति को क्या चढ़ाएं?


9. गणेश मंत्र या स्तोत्र का पाठ करें

सबसे सरल मंत्र:

ॐ गं गणपतये नमः

इसके अलावा लोकप्रिय श्लोक है:

वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

इसे अपनी श्रद्धा के अनुसार पढ़ सकते हैं।


चंद्रमा निकलने के बाद क्या करें?

यही संकष्टी व्रत का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।

चंद्रमा दिखाई देने के बाद:

  1. स्वच्छ पात्र में जल लें।
  2. अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार अक्षत या फूल रख सकते हैं।
  3. चंद्रमा को अर्घ्य दें।
  4. भगवान गणेश को पुनः प्रणाम करें।
  5. प्रसाद ग्रहण करें।
  6. उसके बाद व्रत खोलें।

कुछ परिवारों में चंद्रमा को देखने से पहले संकष्टी कथा पढ़ने की परंपरा भी होती है।

क्षेत्र और कुल परंपरा के अनुसार विधि बदल सकती है।


यदि चंद्रमा बादलों के कारण दिखाई न दे तो?

बारिश, बादल या प्रदूषण के कारण कई बार चंद्रमा दिखाई नहीं देता।

ऐसे में घबराने की जरूरत नहीं है।

पहले अपने शहर का verified moonrise time देखें।

उस समय के बाद चंद्रमा के उदय की पुष्टि हो जाने पर अपनी पारिवारिक या धार्मिक परंपरा के अनुसार पूजा पूरी की जा सकती है।

कुछ परिवार प्रतीकात्मक रूप से चंद्रमा का ध्यान करके अर्घ्य देते हैं।

लेकिन व्रत के नियम परिवार, संप्रदाय और क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकते हैं।

इसलिए यदि आप कठोर धार्मिक नियम का पालन करते हैं तो अपने परिवार के आचार्य या पुरोहित से पूछना बेहतर रहेगा।


संकष्टी चतुर्थी में क्या खा सकते हैं?

यह आपके व्रत के प्रकार पर निर्भर करता है।

कुछ लोग पूरे दिन निर्जला व्रत रखते हैं।

कुछ फलाहार करते हैं।

कुछ परिवारों में:

  • फल
  • दूध
  • दही
  • मखाना
  • साबूदाना
  • कुट्टू
  • सिंघाड़े का आटा
  • सेंधा नमक
  • मूंगफली
  • आलू

जैसी व्रत सामग्री का प्रयोग किया जाता है।

लेकिन क्षेत्रीय परंपराएं अलग हो सकती हैं।

स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर कठोर उपवास करना जरूरी नहीं है।


किन लोगों को कठोर व्रत से बचना चाहिए?

धार्मिक व्रत आस्था का विषय है, लेकिन स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।

यदि किसी व्यक्ति को:

  • diabetes
  • low blood sugar
  • pregnancy
  • kidney problem
  • chronic illness
  • या नियमित दवा

चल रही हो तो लंबे समय तक भूखा रहना हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं हो सकता।

ऐसी स्थिति में चिकित्सकीय सलाह और अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रखें।

भक्ति का अर्थ स्वयं को नुकसान पहुंचाना नहीं है।


गणेश जी को दूर्वा क्यों चढ़ाई जाती है?

गणेश पूजा में दूर्वा एक बहुत प्रसिद्ध पूजन सामग्री है।

धार्मिक परंपरा में भगवान गणेश को दूर्वा प्रिय मानी गई है।

इसीलिए:

  • गणेश चतुर्थी
  • संकष्टी चतुर्थी
  • बुधवार की गणेश पूजा

में दूर्वा चढ़ाने की परंपरा दिखाई देती है।

भक्त सामान्यतः स्वच्छ और ताजी दूर्वा अर्पित करते हैं।

संख्या और चढ़ाने की विधि विभिन्न परंपराओं में अलग हो सकती है।


गणेश जी को मोदक क्यों चढ़ाया जाता है?

भगवान गणेश का नाम लेते ही मोदक की छवि सामने आती है।

कई धार्मिक चित्रों और मूर्तियों में उनके हाथ में मोदक दिखाया जाता है।

मोदक को आनंद, ज्ञान और पूर्णता के प्रतीक के रूप में समझने की परंपरा भी मिलती है।

इसीलिए गणेश पूजा में:

  • मोदक
  • लड्डू

लोकप्रिय भोग माने जाते हैं।

लेकिन यदि ये उपलब्ध न हों तो श्रद्धापूर्वक फल या घर का सात्विक प्रसाद भी चढ़ाया जा सकता है।


क्या मंगलवार को पड़ने वाली संकष्टी अधिक खास मानी जाती है?

29 सितंबर 2026 मंगलवार है।

संकष्टी चतुर्थी का मंगलवार को पड़ना कई धार्मिक परंपराओं में विशेष माना जाता है क्योंकि मंगलवार मंगल ग्रह और हनुमान पूजा से भी जुड़ा दिन माना जाता है।

हालांकि अलग-अलग पंचांगों और क्षेत्रों में इसके नामकरण तथा धार्मिक महत्व की व्याख्या अलग हो सकती है।

इसलिए बिना स्रोत के किसी अत्यधिक चमत्कारी फल का दावा करना उचित नहीं है।

इसे भगवान गणेश की नियमित मासिक उपासना के विशेष अवसर के रूप में देखना बेहतर है।

मंगलवार की धार्मिक परंपराओं और हनुमान उपासना से जुड़े व्यावहारिक आध्यात्मिक संदेशों पर हमारा यह लेख भी पढ़ सकते हैं:

मंगलवार हनुमान शक्ति: इच्छाशक्ति और मनोबल के उपाय


विघ्नराज संकष्टी पर क्या मांगना चाहिए?

धार्मिक दृष्टि से भक्त अपनी इच्छा के अनुसार प्रार्थना कर सकते हैं।

लेकिन गणेश उपासना का गहरा संदेश केवल “इच्छा पूरी हो” तक सीमित नहीं है।

आप प्रार्थना कर सकते हैं:

  • सही निर्णय लेने की बुद्धि मिले
  • अधूरे काम पूरे करने का अनुशासन मिले
  • परिवार में शांति रहे
  • काम में आने वाली बाधाओं का समाधान मिले
  • डर और भ्रम कम हो
  • नई शुरुआत करने का साहस मिले

इस तरह पूजा को केवल चमत्कार की अपेक्षा के बजाय आत्मचिंतन से भी जोड़ा जा सकता है।


संकष्टी चतुर्थी पर कौन-सी गलतियां न करें?

1. गलत तारीख देखकर व्रत न रखें

2026 में सबसे बड़ा confusion यही है।

केवल यह देखकर कि 30 सितंबर को सुबह चतुर्थी है, व्रत 30 सितंबर को न मान लें।

चंद्र दर्शन नियम की वजह से मुख्य व्रत 29 सितंबर को है।


2. पूरे भारत में एक ही चंद्रोदय समय न मानें

Moonrise city-wise बदलता है।

अपने शहर का समय देखें।


3. स्वास्थ्य खराब करके व्रत न करें

जरूरत पड़ने पर फलाहार करें।


4. पूजा को महंगी सामग्री से न जोड़ें

साधारण सामग्री और श्रद्धा पर्याप्त है।


5. सोशल मीडिया के चमत्कारी दावों पर आंख बंद करके भरोसा न करें

“यह उपाय करते ही 24 घंटे में पैसा मिलेगा” जैसी बातें धार्मिक परंपरा की गंभीरता को कम करती हैं।

भगवान गणेश की पूजा को श्रद्धा और आध्यात्मिक अनुशासन से जोड़कर देखें।


क्या संकष्टी व्रत बिना निर्जला उपवास के रखा जा सकता है?

कई परिवारों में संकष्टी व्रत के नियम अलग-अलग हैं।

कहीं निर्जला व्रत रखा जाता है।

कहीं फलाहार किया जाता है।

कहीं सूर्यास्त तक और कहीं चंद्र दर्शन तक विशेष भोजन से परहेज किया जाता है।

यदि आपके परिवार में कोई परंपरा चली आ रही है तो उसी को प्राथमिकता दें।

यदि पहली बार व्रत कर रहे हैं तो अपनी क्षमता के अनुसार सरल रूप अपनाना बेहतर है।


गणेश पूजा में कौन-सा मंत्र सबसे आसान है?

शुरुआती भक्तों के लिए सबसे सरल मंत्र माना जाता है:

ॐ गं गणपतये नमः

इसे 11, 21, 51 या 108 बार अपनी श्रद्धा और समय के अनुसार जप सकते हैं।

संख्या से अधिक महत्वपूर्ण ध्यान और नियमितता है।


क्या गणेश जी की नई मूर्ति खरीदना जरूरी है?

नहीं।

संकष्टी चतुर्थी के लिए हर महीने नई प्रतिमा लाना जरूरी नहीं है।

घर में पहले से मौजूद भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र के सामने पूजा की जा सकती है।

नई मूर्ति स्थापना गणेशोत्सव जैसी अलग परंपरा से जुड़ी हो सकती है।

संकष्टी पूजा सामान्यतः घर के पूजा स्थान पर ही की जा सकती है।


गणपति विसर्जन और संकष्टी का संबंध

सितंबर 2026 में गणेशोत्सव 14 सितंबर से शुरू हुआ और मुख्य विसर्जन 25 सितंबर के आसपास रहा।

इसके कुछ दिन बाद 29 सितंबर को संकष्टी चतुर्थी आ रही है।

यहां दोनों परंपराओं को अलग समझना महत्वपूर्ण है।

विसर्जन गणेशोत्सव की स्थापित प्रतिमा की विधिवत विदाई से जुड़ा है।

संकष्टी मासिक गणेश व्रत है।

गणपति विसर्जन के धार्मिक अर्थ और सही विधि को विस्तार से यहां पढ़ें:

गणपति विसर्जन क्यों किया जाता है? परंपरा और सही विधि


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Vighnaraja Sankashti Chaturthi 2026 FAQ

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी 2026 कब है?

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को रखा जाएगा।

चतुर्थी तिथि कब शुरू होगी?

चतुर्थी तिथि 29 सितंबर को लगभग शाम 5:09 बजे शुरू होगी।

चतुर्थी तिथि कब खत्म होगी?

चतुर्थी तिथि 30 सितंबर 2026 को लगभग दोपहर 2:55 बजे समाप्त होगी।

जब चतुर्थी 30 सितंबर तक है तो व्रत 29 सितंबर को क्यों?

क्योंकि संकष्टी चतुर्थी में चतुर्थी तिथि के दौरान होने वाले चंद्रोदय का महत्व है। 29 सितंबर की रात चतुर्थी रहते हुए चंद्रमा निकलेगा, जबकि 30 सितंबर की रात तक चतुर्थी समाप्त हो चुकी होगी।

29 सितंबर को चंद्रोदय कितने बजे होगा?

समय शहर के अनुसार अलग है। उत्तर प्रदेश के कई शहरों में लगभग 7:30 से 7:45 PM के बीच चंद्रोदय होगा।

व्रत कब खोलें?

पारंपरिक रूप से भगवान गणेश की पूजा और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोला जाता है।

भगवान गणेश को क्या चढ़ाएं?

दूर्वा, फूल, मोदक, लड्डू, फल, रोली, अक्षत और चंदन जैसी सामान्य पूजा सामग्री चढ़ाई जा सकती है।

क्या बिना निर्जला व्रत के भी संकष्टी रख सकते हैं?

व्रत की परंपरा परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकती है। कई लोग फलाहार भी करते हैं। स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए अपनी क्षमता के अनुसार व्रत करना बेहतर है।


जरूरी Disclaimer

यह लेख हिंदू धार्मिक परंपराओं, प्रचलित मान्यताओं और पंचांग संबंधी उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है।

तिथि और पंचांग की गणना विभिन्न स्थानों पर कुछ मिनट अलग दिखाई दे सकती है।

विशेष रूप से चंद्रोदय का समय शहर के अनुसार बदलता है।

किसी विशेष धार्मिक संकल्प, कठिन व्रत या विस्तृत कर्मकांड के लिए अपने परिवार की परंपरा या योग्य पुरोहित से मार्गदर्शन लेना उचित रहेगा।

स्वास्थ्य समस्या, pregnancy, diabetes या नियमित दवा लेने वाले व्यक्ति उपवास से पहले अपनी चिकित्सकीय स्थिति का ध्यान रखें।


अंत में जाते-जाते

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी 2026 की सबसे महत्वपूर्ण बात सिर्फ पूजा की सामग्री या मंत्र नहीं है।

इस बार सबसे पहले इसकी सही तारीख समझना जरूरी है।

चतुर्थी 29 सितंबर की शाम शुरू होकर 30 सितंबर की दोपहर तक रहेगी, लेकिन संकष्टी व्रत 29 सितंबर को इसलिए रखा जाएगा क्योंकि उसी रात चतुर्थी तिथि रहते हुए चंद्रमा का उदय होगा।

यानी यहां केवल “किस दिन चतुर्थी है” पूछना पर्याप्त नहीं है।

सही सवाल है—

चतुर्थी तिथि में चंद्रमा किस दिन निकल रहा है?

यही छोटा-सा नियम तारीख को लेकर होने वाले बड़े confusion को दूर कर देता है।

पूजा करते समय भगवान गणेश से केवल बाधाएं हटाने की प्रार्थना ही न करें।

उनसे ऐसी बुद्धि भी मांगें जिससे हम अपनी गलतियों को पहचान सकें, सही निर्णय ले सकें और मुश्किल परिस्थितियों में धैर्य बनाए रख सकें।

यही विघ्नहर्ता गणपति की उपासना का सबसे उपयोगी जीवन-संदेश भी हो सकता है।

गणपति बप्पा मोरया।