Pithori Amavasya 2026: हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। वर्षभर आने वाली अलग-अलग अमावस्याओं की अपनी धार्मिक परंपराएं हैं, लेकिन भाद्रपद मास से जुड़ी पिठोरी अमावस्या विशेष रूप से परिवार, संतान की मंगलकामना, मातृशक्ति की आराधना और पितरों के स्मरण से जुड़ी मानी जाती है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!वर्ष 2026 में पिठोरी अमावस्या गुरुवार, 10 सितंबर 2026 को मनाई जा रही है। पंचांग के अनुसार नई दिल्ली में चतुर्दशी तिथि 10 सितंबर को सुबह 10:33 बजे तक रहती है, जिसके बाद अमावस्या तिथि शुरू होती है। अमावस्या तिथि 11 सितंबर की सुबह तक रहती है। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय तथा स्थानीय पंचांग गणना के कारण समय में कुछ अंतर हो सकता है।
यही कारण है कि इंटरनेट पर लोगों के बीच यह सवाल भी देखा जा रहा है कि पिठोरी अमावस्या 10 सितंबर को है या 11 सितंबर को? धार्मिक व्रत और पिठोरी पूजन के लिए 10 सितंबर को प्रमुख दिन माना जा रहा है, जबकि अमावस्या तिथि अगले दिन सुबह तक रहने के कारण स्नान-दान जैसी कुछ परंपराएं स्थानीय पंचांग और परंपरा के अनुसार 11 सितंबर की सुबह भी की जा सकती हैं।
इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि पिठोरी अमावस्या क्या है, 2026 में इसकी सही तारीख क्या है, इसका धार्मिक महत्व क्या माना जाता है, 64 योगिनियों से इसका संबंध कैसे बताया जाता है, पितरों के लिए क्या किया जाता है और घर पर सरल तरीके से पूजा कैसे की जा सकती है।
Pithori Amavasya 2026 कब है?
वर्ष 2026 में पिठोरी अमावस्या गुरुवार, 10 सितंबर को मनाई जा रही है।
नई दिल्ली के लिए उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार:
- पिठोरी अमावस्या व्रत: गुरुवार, 10 सितंबर 2026
- अमावस्या तिथि प्रारंभ: 10 सितंबर 2026, सुबह लगभग 10:33 बजे
- अमावस्या तिथि समाप्त: 11 सितंबर 2026, सुबह लगभग 8:56 बजे
- दिन: गुरुवार
ध्यान रखें कि हिंदू पंचांग के मुहूर्त और तिथियों के समय शहर के अनुसार कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है। इसलिए किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान के लिए अपने शहर का स्थानीय पंचांग भी देखना उचित रहता है।
तिथि संबंधी विस्तृत पंचांग देखने के लिए Drik Panchang का New Delhi Panchang देखा जा सकता है।
पिठोरी अमावस्या क्या है?
पिठोरी अमावस्या हिंदू परंपरा में ऐसी अमावस्या है जिसका संबंध विशेष रूप से मातृशक्ति, संतान की मंगलकामना, परिवार की सुख-समृद्धि और वंश की रक्षा से जोड़ा जाता है।
उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार यह भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या से जुड़ी होती है, जबकि महाराष्ट्र और गुजरात जैसे अमांत पंचांग का पालन करने वाले क्षेत्रों में महीने का नाम अलग दिखाई दे सकता है।
यही वजह है कि विभिन्न क्षेत्रों में इसे अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है।
कुछ स्थानों पर इसे:
- पिठोरी अमावस्या
- पिठोरी अमावस
- मातृ अमावस्या
- पोला अमावस्या
- भाद्रपद अमावस्या
जैसे नामों से जाना जाता है।
भारत की धार्मिक विविधता के कारण पूजा-पद्धति में भी क्षेत्रीय अंतर दिखाई देता है। इसलिए किसी एक स्थानीय परंपरा को पूरे भारत की अनिवार्य धार्मिक विधि मानना सही नहीं होगा।
पिठोरी नाम क्यों पड़ा?
पिठोरी शब्द को लेकर धार्मिक परंपराओं में एक दिलचस्प मान्यता मिलती है। इसे संस्कृत के “पिष्ट” या “पिष्टक” जैसे शब्दों से जोड़ा जाता है, जिनका संबंध आटे या पिसे हुए अनाज से बनी आकृतियों से माना जाता है।
कुछ पारंपरिक पिठोरी पूजन विधियों में महिलाएं आटे या अन्य पारंपरिक सामग्री से देवी स्वरूपों की छोटी आकृतियां तैयार करती थीं।
इनमें विशेष रूप से 64 योगिनियों और सप्तमातृकाओं के पूजन की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
आज शहरी जीवन में हर परिवार इस तरह की विस्तृत पूजा नहीं कर पाता, इसलिए अनेक लोग केवल देवी का चित्र स्थापित करके, दीपक जलाकर और संतान तथा परिवार की मंगलकामना करके भी श्रद्धापूर्वक व्रत करते हैं।
पिठोरी अमावस्या और 64 योगिनियों का क्या संबंध है?
पिठोरी अमावस्या की सबसे विशेष धार्मिक परंपराओं में चौंसठ योगिनियों के पूजन का उल्लेख मिलता है।
योगिनी परंपरा भारतीय शक्ति उपासना की अत्यंत प्राचीन परंपराओं में गिनी जाती है। विभिन्न धार्मिक और तांत्रिक परंपराओं में योगिनियों का स्वरूप और नाम अलग-अलग मिल सकता है।
पिठोरी व्रत की लोक परंपराओं में 64 योगिनियों को मातृशक्ति के अनेक रूपों का प्रतीक माना जाता है।
इनके साथ सप्तमातृकाओं की आराधना का भी उल्लेख मिलता है।
इस पूजा के पीछे मुख्य भाव यह माना जाता है कि परिवार पर मातृशक्ति का संरक्षण बना रहे और संतान स्वस्थ, सुरक्षित तथा उन्नतिशील रहे।
हालांकि यह समझना महत्वपूर्ण है कि 64 योगिनी पूजन की विस्तृत विधि सभी राज्यों और सभी परिवारों में समान नहीं है। कई स्थानों पर पिठोरी अमावस्या साधारण देवी पूजन, व्रत और प्रार्थना के रूप में भी मनाई जाती है।
पिठोरी अमावस्या का धार्मिक महत्व
पिठोरी अमावस्या मुख्यतः परिवार और संतान की मंगलकामना से संबंधित मानी जाती है।
पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन माताएं अपनी संतान की रक्षा, दीर्घायु, सफलता और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
इस दिन देवी के विभिन्न मातृ स्वरूपों का स्मरण करने की परंपरा है।
अमावस्या होने के कारण यह दिन पितृ स्मरण से भी जुड़ जाता है।
सनातन परंपरा में अमावस्या के दिन अपने पूर्वजों को याद करना, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना, जरूरतमंदों को भोजन या दान देना और परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करना शुभ माना गया है।
यही कारण है कि पिठोरी अमावस्या में दो महत्वपूर्ण भाव एक साथ दिखाई देते हैं—
मातृशक्ति की आराधना और पितरों का स्मरण।
धार्मिक और ज्योतिष से जुड़े ऐसे अन्य विषयों को सरल हिंदी में समझने के लिए आप The Rising Irish का ज्योतिष सीखें सेक्शन भी पढ़ सकते हैं।
पिठोरी अमावस्या व्रत कौन रख सकता है?
पारंपरिक रूप से पिठोरी व्रत का संबंध माताओं और विवाहित महिलाओं से अधिक बताया जाता है।
विशेष रूप से संतान की मंगलकामना के लिए माताओं द्वारा व्रत रखने की परंपरा रही है।
लेकिन धार्मिक उपासना को केवल इसी सीमा में बांधना आवश्यक नहीं है।
यदि कोई व्यक्ति परिवार की सुख-शांति, देवी आराधना या अपने पितरों के स्मरण के लिए श्रद्धापूर्वक पूजा करना चाहता है, तो वह अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा कर सकता है।
व्रत करते समय स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है। बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं, बीमार व्यक्ति या नियमित दवा लेने वाले लोग कठोर उपवास करने के बजाय सामान्य सात्विक भोजन के साथ पूजा कर सकते हैं।
धर्म में श्रद्धा का महत्व है; स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाना उद्देश्य नहीं होना चाहिए।
घर पर पिठोरी अमावस्या पूजा कैसे करें?
यदि आपके परिवार में कोई विशेष पारंपरिक पिठोरी पूजा पद्धति नहीं है, तो सामान्य रूप से सरल पूजा की जा सकती है।
1. सुबह स्नान करें
दिन की शुरुआत स्वच्छता से करें।
स्नान के बाद साफ कपड़े पहनें और पूजा स्थान को साफ करें।
यदि संभव हो तो पूजा स्थल पर गंगाजल या साफ जल का छिड़काव किया जा सकता है।
2. पूजा का संकल्प लें
अपने मन में देवी और अपने इष्ट देव का स्मरण करें।
संकल्प बहुत जटिल संस्कृत मंत्र में ही करना आवश्यक नहीं है।
सरल शब्दों में भी कहा जा सकता है:
“मैं अपने परिवार, संतान और पूर्वजों की शांति तथा मंगलकामना के लिए श्रद्धापूर्वक पिठोरी अमावस्या की पूजा कर रहा/रही हूं।”
3. देवी का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें
अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार माता पार्वती, देवी दुर्गा या मातृशक्ति के किसी स्वरूप का चित्र स्थापित किया जा सकता है।
जहां पारंपरिक पिठोरी पूजन किया जाता है, वहां 64 योगिनियों और सप्तमातृकाओं से जुड़ी प्रतीकात्मक आकृतियां भी रखी जाती हैं।
4. दीपक जलाएं
घी या तेल का दीपक जलाकर भगवान और देवी का स्मरण करें।
धूप और अगरबत्ती भी अर्पित की जा सकती है।
5. फूल और प्रसाद अर्पित करें
मौसमी फल, फूल, मिठाई या घर में बना सात्विक प्रसाद चढ़ाया जा सकता है।
पूजा में दिखावे से अधिक श्रद्धा को महत्व देना चाहिए।
6. मातृशक्ति का स्मरण करें
देवी से परिवार और संतान की रक्षा, सद्बुद्धि और स्वस्थ जीवन की प्रार्थना करें।
आप दुर्गा मंत्र, देवी स्तुति या अपनी श्रद्धा के अनुसार सामान्य प्रार्थना भी कर सकते हैं।
7. पितरों को याद करें
अमावस्या के दिन अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी और पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करें।
पारिवारिक परंपरा में तर्पण किया जाता हो तो उसी विधि का पालन करें।
पिठोरी अमावस्या पर पितरों के लिए क्या करें?
अमावस्या तिथि पितरों के स्मरण से परंपरागत रूप से जुड़ी हुई है।
यदि आप विस्तृत श्राद्ध या वैदिक तर्पण विधि नहीं जानते, तब भी कुछ सरल कार्य किए जा सकते हैं।
अपने पितरों को मन से प्रणाम करें।
उनके अच्छे कार्यों और संस्कारों को याद करें।
किसी जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन करा सकते हैं।
पक्षियों या गायों के लिए भोजन रख सकते हैं, यदि यह आपके क्षेत्र में सुरक्षित और उचित तरीके से किया जा सके।
आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र या आवश्यक वस्तुओं का दान किया जा सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पितृ स्मरण को भय से नहीं बल्कि कृतज्ञता के भाव से किया जाए।
“यदि ऐसा नहीं किया तो अनिष्ट होगा” जैसी डर पैदा करने वाली बातों से बचना चाहिए।
क्या पिठोरी अमावस्या पर तर्पण जरूरी है?
हर व्यक्ति के लिए वैदिक तर्पण करना अनिवार्य नहीं कहा जा सकता।
तर्पण की विस्तृत वैदिक प्रक्रिया परिवार, क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
यदि आपके परिवार में पहले से तर्पण की परंपरा है तो किसी जानकार पुरोहित या परिवार के बुजुर्ग से विधि समझना बेहतर है।
जो लोग विधि नहीं जानते, वे अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करके, जल अर्पित करके तथा दान-पुण्य करके भी अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर सकते हैं।
पिठोरी अमावस्या पर क्या दान करें?
अमावस्या पर जरूरतमंदों की सहायता करना पुण्य कर्म माना जाता है।
अपनी क्षमता के अनुसार आप निम्न वस्तुओं का दान कर सकते हैं:
- अन्न
- आटा
- दाल
- चावल
- फल
- कपड़े
- भोजन
- दैनिक उपयोग की आवश्यक वस्तुएं
दान करते समय व्यक्ति की वास्तविक जरूरत को प्राथमिकता दें।
सिर्फ किसी कथित “ग्रह दोष” को समाप्त करने के डर से महंगी वस्तुएं दान करना आवश्यक नहीं है।
दान का मूल भाव करुणा और सहायता होना चाहिए।
पिठोरी अमावस्या पर दीपदान का महत्व
अनेक हिंदू परंपराओं में अमावस्या पर दीपक जलाने का विशेष महत्व माना जाता है।
अंधकार के बीच प्रकाश जलाना प्रतीकात्मक रूप से आशा, ज्ञान और सकारात्मकता का संकेत है।
पितरों के स्मरण में भी कई परिवार दीपक जलाते हैं।
लेकिन दीपक किस दिशा में, किस तेल से और कितनी संख्या में जलाना चाहिए—इसे लेकर अलग-अलग स्थानीय मान्यताएं हैं।
इसलिए किसी एक नियम को सार्वभौमिक धार्मिक आदेश मानने की बजाय अपने परिवार की परंपरा का पालन करना उचित है।
पिठोरी अमावस्या पर क्या करें?
इस दिन आप कुछ सरल आध्यात्मिक कार्य कर सकते हैं।
सुबह स्नान कर भगवान का स्मरण करें।
घर और पूजा स्थान को स्वच्छ रखें।
माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान करें।
अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें।
जरूरतमंदों को भोजन या सहायता दें।
परिवार के साथ कुछ समय प्रार्थना और सकारात्मक बातचीत में बिताएं।
क्रोध, विवाद और अनावश्यक कटुता से बचने का प्रयास करें।
यदि व्रत रखते हैं तो अपनी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखें।
पिठोरी अमावस्या पर क्या नहीं करना चाहिए?
धर्म के नाम पर डर और अंधविश्वास फैलाने से बचना सबसे जरूरी है।
अमावस्या से जुड़ी बहुत सी बातें सोशल मीडिया पर वायरल होती रहती हैं, जिनका कोई स्पष्ट धार्मिक या ऐतिहासिक आधार नहीं होता।
ऐसी बातों पर तुरंत विश्वास न करें जैसे—
“यह काम किया तो तुरंत धन मिलेगा।”
“यह चीज घर में रखी तो रातोंरात किस्मत बदल जाएगी।”
“आज यह उपाय नहीं किया तो पूरे साल नुकसान होगा।”
धार्मिक परंपरा का उद्देश्य मन में श्रद्धा, अनुशासन और सकारात्मकता लाना है, भय पैदा करना नहीं।
पिठोरी अमावस्या और भाद्रपद अमावस्या में क्या अंतर है?
यह प्रश्न काफी लोगों को भ्रमित करता है।
वास्तव में इसका बड़ा कारण भारत में प्रचलित अलग-अलग चंद्र कैलेंडर प्रणालियां हैं।
उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में पूर्णिमांत पंचांग चलता है, जिसमें महीने की गणना पूर्णिमा के आधार पर होती है।
महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में अमांत पंचांग का प्रभाव अधिक है, जिसमें महीना अमावस्या पर समाप्त होता है।
इसी कारण एक ही तिथि को अलग-अलग क्षेत्रीय पंचांगों में महीने का नाम अलग दिखाई दे सकता है।
Drik Panchang के 10 सितंबर 2026 के New Delhi पंचांग में पूर्णिमांत महीना भाद्रपद जबकि अमांत महीना श्रावण दिखाया गया है।
इसलिए इंटरनेट पर “श्रावण अमावस्या”, “भाद्रपद अमावस्या” या “पिठोरी अमावस्या” जैसे अलग-अलग नाम देखकर भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है।
10 सितंबर या 11 सितंबर – आखिर अमावस्या किस दिन?
2026 में यह प्रश्न खास तौर पर महत्वपूर्ण है।
नई दिल्ली पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 10 सितंबर को सुबह 10:33 बजे के बाद शुरू होकर 11 सितंबर सुबह लगभग 8:56 बजे तक रहती है।
इसलिए दोनों तारीखें अमावस्या तिथि को छू रही हैं।
लेकिन पिठोरी अमावस्या व्रत और पूजा 10 सितंबर 2026, गुरुवार को सूचीबद्ध है।
वहीं कुछ स्नान-दान या सूर्योदय आधारित परंपराएं 11 सितंबर की सुबह अमावस्या तिथि रहते हुए की जा सकती हैं।
इसी कारण अलग-अलग वेबसाइटों या कैलेंडरों पर 10 और 11 सितंबर दोनों तारीखें दिखाई दे सकती हैं।
The Economic Times की 9 सितंबर 2026 की रिपोर्ट ने भी इसी तारीख संबंधी भ्रम को स्पष्ट करते हुए पिठोरी अमावस्या के व्रत के लिए 10 सितंबर बताया है।
पिठोरी अमावस्या तारीख संबंधी रिपोर्ट यहां पढ़ें
गुरुवार को अमावस्या पड़ने का क्या महत्व है?
2026 में पिठोरी अमावस्या गुरुवार के दिन पड़ रही है।
हिंदू परंपरा में गुरुवार का संबंध भगवान विष्णु, बृहस्पति देव और गुरु तत्व से माना जाता है।
इसीलिए कुछ श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु या अपने गुरु का भी स्मरण कर सकते हैं।
हालांकि पिठोरी अमावस्या का मूल धार्मिक महत्व मातृशक्ति, संतान और अमावस्या संबंधी परंपराओं से ही जुड़ा है।
सिर्फ गुरुवार होने के कारण कोई असाधारण फल या निश्चित चमत्कार होने का दावा करना उचित नहीं होगा।
अमावस्या के दिन कुंडली या ज्योतिष देखना चाहिए?
अमावस्या को लेकर यह भी एक आम सवाल है।
जन्म कुंडली का विश्लेषण किसी एक तिथि पर निर्भर नहीं होता। कुंडली व्यक्ति की जन्म तिथि, जन्म समय और जन्म स्थान के आधार पर देखी जाती है।
इसलिए अमावस्या के दिन भी अपनी जन्म कुंडली के बारे में जानकारी ली जा सकती है।
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पिठोरी अमावस्या की पूजा में सबसे महत्वपूर्ण क्या है?
कई बार लोग पूजा सामग्री और जटिल नियमों में इतने उलझ जाते हैं कि पूजा के मूल भाव को भूल जाते हैं।
पिठोरी अमावस्या का सबसे सुंदर संदेश परिवार के प्रति जिम्मेदारी, मातृशक्ति का सम्मान, संतान के कल्याण की कामना और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता में देखा जा सकता है।
महंगी सामग्री या बहुत बड़ी पूजा से अधिक महत्वपूर्ण श्रद्धा और सदाचार हैं।
अगर किसी परिवार में पारंपरिक विधि पीढ़ियों से चली आ रही है, तो उसका सम्मान करते हुए उसका पालन किया जा सकता है।
और यदि ऐसी कोई परंपरा नहीं है तो सरल पूजा भी पर्याप्त है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – Pithori Amavasya 2026 FAQ
पिठोरी अमावस्या 2026 कब है?
पिठोरी अमावस्या का व्रत गुरुवार, 10 सितंबर 2026 को है।
2026 में अमावस्या तिथि कब शुरू होगी?
नई दिल्ली पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 10 सितंबर को सुबह लगभग 10:33 बजे शुरू होती है।
अमावस्या तिथि कब समाप्त होगी?
नई दिल्ली के अनुसार यह 11 सितंबर 2026 की सुबह लगभग 8:56 बजे समाप्त होती है। स्थान के अनुसार पंचांग समय में मामूली अंतर संभव है।
पिठोरी अमावस्या किसकी पूजा के लिए प्रसिद्ध है?
पारंपरिक रूप से यह मातृशक्ति, 64 योगिनियों, सप्तमातृकाओं और संतान की मंगलकामना से जुड़ी मानी जाती है।
क्या पिठोरी अमावस्या पर पितरों का तर्पण किया जा सकता है?
अमावस्या पर पितृ स्मरण और तर्पण की परंपरा है। विस्तृत तर्पण विधि परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकती है।
क्या बिना व्रत के पूजा की जा सकती है?
हां। स्वास्थ्य या अन्य कारणों से कठोर व्रत संभव न हो तो श्रद्धापूर्वक सामान्य पूजा, प्रार्थना और दान किया जा सकता है।
क्या पिठोरी अमावस्या और भाद्रपद अमावस्या एक ही हैं?
अनेक क्षेत्रों में पिठोरी अमावस्या को भाद्रपद अमावस्या के संदर्भ में ही जाना जाता है। अमांत और पूर्णिमांत पंचांग के कारण महीने के नाम में क्षेत्रीय अंतर हो सकता है।
10 सितंबर और 11 सितंबर दोनों तारीखें क्यों दिखाई दे रही हैं?
क्योंकि अमावस्या तिथि 10 सितंबर को शुरू होकर 11 सितंबर की सुबह तक रहती है। पिठोरी व्रत 10 सितंबर को है, जबकि कुछ सूर्योदय आधारित अमावस्या कर्म 11 सितंबर को स्थानीय परंपरा के अनुसार किए जा सकते हैं।
विश्वसनीय स्रोत
तिथि और पंचांग संबंधी जानकारी के लिए इस लेख में मुख्य रूप से निम्न स्रोतों का संदर्भ लिया गया है:
Drik Panchang – New Delhi, September 2026
The Economic Times – Pithori Amavasya 2026 Date
धार्मिक परंपराओं में क्षेत्र, परिवार और संप्रदाय के अनुसार अंतर हो सकता है।
धार्मिक जानकारी संबंधी अस्वीकरण
इस लेख में दी गई पूजा-विधि, धार्मिक मान्यताएं, व्रत, योगिनी पूजा, पितृ तर्पण और दान से संबंधित जानकारी धार्मिक परंपराओं, पंचांग और सामान्य मान्यताओं पर आधारित है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में विधि अलग हो सकती है। यह लेख किसी निश्चित आध्यात्मिक परिणाम या चमत्कार की गारंटी नहीं देता। किसी विशेष वैदिक अनुष्ठान के लिए अपने परिवार के जानकार बुजुर्ग या योग्य आचार्य से सलाह लेना उचित है।
अंत में जाते-जाते
पिठोरी अमावस्या केवल एक व्रत या पंचांग की तारीख नहीं है। इसकी परंपराओं के भीतर परिवार, मातृत्व, संतान के प्रति जिम्मेदारी और अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता जैसे गहरे भाव दिखाई देते हैं।
10 सितंबर 2026 को पिठोरी अमावस्या के अवसर पर यदि आप विस्तृत पूजा नहीं भी कर पाएं, तो कुछ समय शांत होकर अपने इष्ट देव का स्मरण करें, अपने माता-पिता और पूर्वजों के प्रति आभार व्यक्त करें और सामर्थ्य के अनुसार किसी जरूरतमंद की सहायता करें।
सनातन धर्म और भारतीय धार्मिक परंपराओं से जुड़ी और रोचक जानकारियां पढ़ने के लिए The Rising Irish के Dharmik Shorts Gyan सेक्शन से भी जुड़े रहें।
आप सभी पर महादेव की कृपा बनी रहे। हर हर महादेव।
पिठोरी अमावस्या 2026: आज 10 सितंबर को पिठोरी अमावस्या, जानें तिथि, पूजा विधि, 64 योगिनी पूजा और पितृ तर्पण
Pithori Amavasya 2026: हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। वर्षभर आने वाली अलग-अलग अमावस्याओं की अपनी धार्मिक परंपराएं हैं, लेकिन भाद्रपद मास से जुड़ी पिठोरी अमावस्या विशेष रूप से परिवार, संतान की मंगलकामना, मातृशक्ति की आराधना और पितरों के स्मरण से जुड़ी मानी जाती है।
वर्ष 2026 में पिठोरी अमावस्या गुरुवार, 10 सितंबर 2026 को मनाई जा रही है। पंचांग के अनुसार नई दिल्ली में चतुर्दशी तिथि 10 सितंबर को सुबह 10:33 बजे तक रहती है, जिसके बाद अमावस्या तिथि शुरू होती है। अमावस्या तिथि 11 सितंबर की सुबह तक रहती है। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय तथा स्थानीय पंचांग गणना के कारण समय में कुछ अंतर हो सकता है।
यही कारण है कि इंटरनेट पर लोगों के बीच यह सवाल भी देखा जा रहा है कि पिठोरी अमावस्या 10 सितंबर को है या 11 सितंबर को? धार्मिक व्रत और पिठोरी पूजन के लिए 10 सितंबर को प्रमुख दिन माना जा रहा है, जबकि अमावस्या तिथि अगले दिन सुबह तक रहने के कारण स्नान-दान जैसी कुछ परंपराएं स्थानीय पंचांग और परंपरा के अनुसार 11 सितंबर की सुबह भी की जा सकती हैं।
इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि पिठोरी अमावस्या क्या है, 2026 में इसकी सही तारीख क्या है, इसका धार्मिक महत्व क्या माना जाता है, 64 योगिनियों से इसका संबंध कैसे बताया जाता है, पितरों के लिए क्या किया जाता है और घर पर सरल तरीके से पूजा कैसे की जा सकती है।
Pithori Amavasya 2026 कब है?
वर्ष 2026 में पिठोरी अमावस्या गुरुवार, 10 सितंबर को मनाई जा रही है।
नई दिल्ली के लिए उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार:
- पिठोरी अमावस्या व्रत: गुरुवार, 10 सितंबर 2026
- अमावस्या तिथि प्रारंभ: 10 सितंबर 2026, सुबह लगभग 10:33 बजे
- अमावस्या तिथि समाप्त: 11 सितंबर 2026, सुबह लगभग 8:56 बजे
- दिन: गुरुवार
ध्यान रखें कि हिंदू पंचांग के मुहूर्त और तिथियों के समय शहर के अनुसार कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है। इसलिए किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान के लिए अपने शहर का स्थानीय पंचांग भी देखना उचित रहता है।
तिथि संबंधी विस्तृत पंचांग देखने के लिए Drik Panchang का New Delhi Panchang देखा जा सकता है।
पिठोरी अमावस्या क्या है?
पिठोरी अमावस्या हिंदू परंपरा में ऐसी अमावस्या है जिसका संबंध विशेष रूप से मातृशक्ति, संतान की मंगलकामना, परिवार की सुख-समृद्धि और वंश की रक्षा से जोड़ा जाता है।
उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार यह भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या से जुड़ी होती है, जबकि महाराष्ट्र और गुजरात जैसे अमांत पंचांग का पालन करने वाले क्षेत्रों में महीने का नाम अलग दिखाई दे सकता है।
यही वजह है कि विभिन्न क्षेत्रों में इसे अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है।
कुछ स्थानों पर इसे:
- पिठोरी अमावस्या
- पिठोरी अमावस
- मातृ अमावस्या
- पोला अमावस्या
- भाद्रपद अमावस्या
जैसे नामों से जाना जाता है।
भारत की धार्मिक विविधता के कारण पूजा-पद्धति में भी क्षेत्रीय अंतर दिखाई देता है। इसलिए किसी एक स्थानीय परंपरा को पूरे भारत की अनिवार्य धार्मिक विधि मानना सही नहीं होगा।
पिठोरी नाम क्यों पड़ा?
पिठोरी शब्द को लेकर धार्मिक परंपराओं में एक दिलचस्प मान्यता मिलती है। इसे संस्कृत के “पिष्ट” या “पिष्टक” जैसे शब्दों से जोड़ा जाता है, जिनका संबंध आटे या पिसे हुए अनाज से बनी आकृतियों से माना जाता है।
कुछ पारंपरिक पिठोरी पूजन विधियों में महिलाएं आटे या अन्य पारंपरिक सामग्री से देवी स्वरूपों की छोटी आकृतियां तैयार करती थीं।
इनमें विशेष रूप से 64 योगिनियों और सप्तमातृकाओं के पूजन की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
आज शहरी जीवन में हर परिवार इस तरह की विस्तृत पूजा नहीं कर पाता, इसलिए अनेक लोग केवल देवी का चित्र स्थापित करके, दीपक जलाकर और संतान तथा परिवार की मंगलकामना करके भी श्रद्धापूर्वक व्रत करते हैं।
पिठोरी अमावस्या और 64 योगिनियों का क्या संबंध है?
पिठोरी अमावस्या की सबसे विशेष धार्मिक परंपराओं में चौंसठ योगिनियों के पूजन का उल्लेख मिलता है।
योगिनी परंपरा भारतीय शक्ति उपासना की अत्यंत प्राचीन परंपराओं में गिनी जाती है। विभिन्न धार्मिक और तांत्रिक परंपराओं में योगिनियों का स्वरूप और नाम अलग-अलग मिल सकता है।
पिठोरी व्रत की लोक परंपराओं में 64 योगिनियों को मातृशक्ति के अनेक रूपों का प्रतीक माना जाता है।
इनके साथ सप्तमातृकाओं की आराधना का भी उल्लेख मिलता है।
इस पूजा के पीछे मुख्य भाव यह माना जाता है कि परिवार पर मातृशक्ति का संरक्षण बना रहे और संतान स्वस्थ, सुरक्षित तथा उन्नतिशील रहे।
हालांकि यह समझना महत्वपूर्ण है कि 64 योगिनी पूजन की विस्तृत विधि सभी राज्यों और सभी परिवारों में समान नहीं है। कई स्थानों पर पिठोरी अमावस्या साधारण देवी पूजन, व्रत और प्रार्थना के रूप में भी मनाई जाती है।
पिठोरी अमावस्या का धार्मिक महत्व
पिठोरी अमावस्या मुख्यतः परिवार और संतान की मंगलकामना से संबंधित मानी जाती है।
पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन माताएं अपनी संतान की रक्षा, दीर्घायु, सफलता और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
इस दिन देवी के विभिन्न मातृ स्वरूपों का स्मरण करने की परंपरा है।
अमावस्या होने के कारण यह दिन पितृ स्मरण से भी जुड़ जाता है।
सनातन परंपरा में अमावस्या के दिन अपने पूर्वजों को याद करना, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना, जरूरतमंदों को भोजन या दान देना और परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करना शुभ माना गया है।
यही कारण है कि पिठोरी अमावस्या में दो महत्वपूर्ण भाव एक साथ दिखाई देते हैं—
मातृशक्ति की आराधना और पितरों का स्मरण।
धार्मिक और ज्योतिष से जुड़े ऐसे अन्य विषयों को सरल हिंदी में समझने के लिए आप The Rising Irish का ज्योतिष सीखें सेक्शन भी पढ़ सकते हैं।
पिठोरी अमावस्या व्रत कौन रख सकता है?
पारंपरिक रूप से पिठोरी व्रत का संबंध माताओं और विवाहित महिलाओं से अधिक बताया जाता है।
विशेष रूप से संतान की मंगलकामना के लिए माताओं द्वारा व्रत रखने की परंपरा रही है।
लेकिन धार्मिक उपासना को केवल इसी सीमा में बांधना आवश्यक नहीं है।
यदि कोई व्यक्ति परिवार की सुख-शांति, देवी आराधना या अपने पितरों के स्मरण के लिए श्रद्धापूर्वक पूजा करना चाहता है, तो वह अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा कर सकता है।
व्रत करते समय स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है। बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं, बीमार व्यक्ति या नियमित दवा लेने वाले लोग कठोर उपवास करने के बजाय सामान्य सात्विक भोजन के साथ पूजा कर सकते हैं।
धर्म में श्रद्धा का महत्व है; स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाना उद्देश्य नहीं होना चाहिए।
घर पर पिठोरी अमावस्या पूजा कैसे करें?
यदि आपके परिवार में कोई विशेष पारंपरिक पिठोरी पूजा पद्धति नहीं है, तो सामान्य रूप से सरल पूजा की जा सकती है।
1. सुबह स्नान करें
दिन की शुरुआत स्वच्छता से करें।
स्नान के बाद साफ कपड़े पहनें और पूजा स्थान को साफ करें।
यदि संभव हो तो पूजा स्थल पर गंगाजल या साफ जल का छिड़काव किया जा सकता है।
2. पूजा का संकल्प लें
अपने मन में देवी और अपने इष्ट देव का स्मरण करें।
संकल्प बहुत जटिल संस्कृत मंत्र में ही करना आवश्यक नहीं है।
सरल शब्दों में भी कहा जा सकता है:
“मैं अपने परिवार, संतान और पूर्वजों की शांति तथा मंगलकामना के लिए श्रद्धापूर्वक पिठोरी अमावस्या की पूजा कर रहा/रही हूं।”
3. देवी का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें
अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार माता पार्वती, देवी दुर्गा या मातृशक्ति के किसी स्वरूप का चित्र स्थापित किया जा सकता है।
जहां पारंपरिक पिठोरी पूजन किया जाता है, वहां 64 योगिनियों और सप्तमातृकाओं से जुड़ी प्रतीकात्मक आकृतियां भी रखी जाती हैं।
4. दीपक जलाएं
घी या तेल का दीपक जलाकर भगवान और देवी का स्मरण करें।
धूप और अगरबत्ती भी अर्पित की जा सकती है।
5. फूल और प्रसाद अर्पित करें
मौसमी फल, फूल, मिठाई या घर में बना सात्विक प्रसाद चढ़ाया जा सकता है।
पूजा में दिखावे से अधिक श्रद्धा को महत्व देना चाहिए।
6. मातृशक्ति का स्मरण करें
देवी से परिवार और संतान की रक्षा, सद्बुद्धि और स्वस्थ जीवन की प्रार्थना करें।
आप दुर्गा मंत्र, देवी स्तुति या अपनी श्रद्धा के अनुसार सामान्य प्रार्थना भी कर सकते हैं।
7. पितरों को याद करें
अमावस्या के दिन अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी और पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करें।
पारिवारिक परंपरा में तर्पण किया जाता हो तो उसी विधि का पालन करें।
पिठोरी अमावस्या पर पितरों के लिए क्या करें?
अमावस्या तिथि पितरों के स्मरण से परंपरागत रूप से जुड़ी हुई है।
यदि आप विस्तृत श्राद्ध या वैदिक तर्पण विधि नहीं जानते, तब भी कुछ सरल कार्य किए जा सकते हैं।
अपने पितरों को मन से प्रणाम करें।
उनके अच्छे कार्यों और संस्कारों को याद करें।
किसी जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन करा सकते हैं।
पक्षियों या गायों के लिए भोजन रख सकते हैं, यदि यह आपके क्षेत्र में सुरक्षित और उचित तरीके से किया जा सके।
आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र या आवश्यक वस्तुओं का दान किया जा सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पितृ स्मरण को भय से नहीं बल्कि कृतज्ञता के भाव से किया जाए।
“यदि ऐसा नहीं किया तो अनिष्ट होगा” जैसी डर पैदा करने वाली बातों से बचना चाहिए।
क्या पिठोरी अमावस्या पर तर्पण जरूरी है?
हर व्यक्ति के लिए वैदिक तर्पण करना अनिवार्य नहीं कहा जा सकता।
तर्पण की विस्तृत वैदिक प्रक्रिया परिवार, क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
यदि आपके परिवार में पहले से तर्पण की परंपरा है तो किसी जानकार पुरोहित या परिवार के बुजुर्ग से विधि समझना बेहतर है।
जो लोग विधि नहीं जानते, वे अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करके, जल अर्पित करके तथा दान-पुण्य करके भी अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर सकते हैं।
पिठोरी अमावस्या पर क्या दान करें?
अमावस्या पर जरूरतमंदों की सहायता करना पुण्य कर्म माना जाता है।
अपनी क्षमता के अनुसार आप निम्न वस्तुओं का दान कर सकते हैं:
- अन्न
- आटा
- दाल
- चावल
- फल
- कपड़े
- भोजन
- दैनिक उपयोग की आवश्यक वस्तुएं
दान करते समय व्यक्ति की वास्तविक जरूरत को प्राथमिकता दें।
सिर्फ किसी कथित “ग्रह दोष” को समाप्त करने के डर से महंगी वस्तुएं दान करना आवश्यक नहीं है।
दान का मूल भाव करुणा और सहायता होना चाहिए।
पिठोरी अमावस्या पर दीपदान का महत्व
अनेक हिंदू परंपराओं में अमावस्या पर दीपक जलाने का विशेष महत्व माना जाता है।
अंधकार के बीच प्रकाश जलाना प्रतीकात्मक रूप से आशा, ज्ञान और सकारात्मकता का संकेत है।
पितरों के स्मरण में भी कई परिवार दीपक जलाते हैं।
लेकिन दीपक किस दिशा में, किस तेल से और कितनी संख्या में जलाना चाहिए—इसे लेकर अलग-अलग स्थानीय मान्यताएं हैं।
इसलिए किसी एक नियम को सार्वभौमिक धार्मिक आदेश मानने की बजाय अपने परिवार की परंपरा का पालन करना उचित है।
पिठोरी अमावस्या पर क्या करें?
इस दिन आप कुछ सरल आध्यात्मिक कार्य कर सकते हैं।
सुबह स्नान कर भगवान का स्मरण करें।
घर और पूजा स्थान को स्वच्छ रखें।
माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान करें।
अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें।
जरूरतमंदों को भोजन या सहायता दें।
परिवार के साथ कुछ समय प्रार्थना और सकारात्मक बातचीत में बिताएं।
क्रोध, विवाद और अनावश्यक कटुता से बचने का प्रयास करें।
यदि व्रत रखते हैं तो अपनी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखें।
पिठोरी अमावस्या पर क्या नहीं करना चाहिए?
धर्म के नाम पर डर और अंधविश्वास फैलाने से बचना सबसे जरूरी है।
अमावस्या से जुड़ी बहुत सी बातें सोशल मीडिया पर वायरल होती रहती हैं, जिनका कोई स्पष्ट धार्मिक या ऐतिहासिक आधार नहीं होता।
ऐसी बातों पर तुरंत विश्वास न करें जैसे—
“यह काम किया तो तुरंत धन मिलेगा।”
“यह चीज घर में रखी तो रातोंरात किस्मत बदल जाएगी।”
“आज यह उपाय नहीं किया तो पूरे साल नुकसान होगा।”
धार्मिक परंपरा का उद्देश्य मन में श्रद्धा, अनुशासन और सकारात्मकता लाना है, भय पैदा करना नहीं।
पिठोरी अमावस्या और भाद्रपद अमावस्या में क्या अंतर है?
यह प्रश्न काफी लोगों को भ्रमित करता है।
वास्तव में इसका बड़ा कारण भारत में प्रचलित अलग-अलग चंद्र कैलेंडर प्रणालियां हैं।
उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में पूर्णिमांत पंचांग चलता है, जिसमें महीने की गणना पूर्णिमा के आधार पर होती है।
महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में अमांत पंचांग का प्रभाव अधिक है, जिसमें महीना अमावस्या पर समाप्त होता है।
इसी कारण एक ही तिथि को अलग-अलग क्षेत्रीय पंचांगों में महीने का नाम अलग दिखाई दे सकता है।
Drik Panchang के 10 सितंबर 2026 के New Delhi पंचांग में पूर्णिमांत महीना भाद्रपद जबकि अमांत महीना श्रावण दिखाया गया है।
इसलिए इंटरनेट पर “श्रावण अमावस्या”, “भाद्रपद अमावस्या” या “पिठोरी अमावस्या” जैसे अलग-अलग नाम देखकर भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है।
10 सितंबर या 11 सितंबर – आखिर अमावस्या किस दिन?
2026 में यह प्रश्न खास तौर पर महत्वपूर्ण है।
नई दिल्ली पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 10 सितंबर को सुबह 10:33 बजे के बाद शुरू होकर 11 सितंबर सुबह लगभग 8:56 बजे तक रहती है।
इसलिए दोनों तारीखें अमावस्या तिथि को छू रही हैं।
लेकिन पिठोरी अमावस्या व्रत और पूजा 10 सितंबर 2026, गुरुवार को सूचीबद्ध है।
वहीं कुछ स्नान-दान या सूर्योदय आधारित परंपराएं 11 सितंबर की सुबह अमावस्या तिथि रहते हुए की जा सकती हैं।
इसी कारण अलग-अलग वेबसाइटों या कैलेंडरों पर 10 और 11 सितंबर दोनों तारीखें दिखाई दे सकती हैं।
The Economic Times की 9 सितंबर 2026 की रिपोर्ट ने भी इसी तारीख संबंधी भ्रम को स्पष्ट करते हुए पिठोरी अमावस्या के व्रत के लिए 10 सितंबर बताया है।
पिठोरी अमावस्या तारीख संबंधी रिपोर्ट यहां पढ़ें
गुरुवार को अमावस्या पड़ने का क्या महत्व है?
2026 में पिठोरी अमावस्या गुरुवार के दिन पड़ रही है।
हिंदू परंपरा में गुरुवार का संबंध भगवान विष्णु, बृहस्पति देव और गुरु तत्व से माना जाता है।
इसीलिए कुछ श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु या अपने गुरु का भी स्मरण कर सकते हैं।
हालांकि पिठोरी अमावस्या का मूल धार्मिक महत्व मातृशक्ति, संतान और अमावस्या संबंधी परंपराओं से ही जुड़ा है।
सिर्फ गुरुवार होने के कारण कोई असाधारण फल या निश्चित चमत्कार होने का दावा करना उचित नहीं होगा।
अमावस्या के दिन कुंडली या ज्योतिष देखना चाहिए?
अमावस्या को लेकर यह भी एक आम सवाल है।
जन्म कुंडली का विश्लेषण किसी एक तिथि पर निर्भर नहीं होता। कुंडली व्यक्ति की जन्म तिथि, जन्म समय और जन्म स्थान के आधार पर देखी जाती है।
इसलिए अमावस्या के दिन भी अपनी जन्म कुंडली के बारे में जानकारी ली जा सकती है।
यदि आप अपनी कुंडली में लग्न, चंद्र राशि, ग्रहों की स्थिति और विभिन्न ज्योतिषीय संकेतों को सरल हिंदी में समझना चाहते हैं, तो The Rising Irish का Kundli Gyan GPT भी देख सकते हैं।
AI आधारित ज्योतिषीय जानकारी को मार्गदर्शन और शैक्षिक संदर्भ के रूप में ही लेना चाहिए; जीवन के महत्वपूर्ण चिकित्सा, कानूनी या वित्तीय निर्णय केवल ज्योतिष के आधार पर नहीं लेने चाहिए।
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अमावस्या के साथ चंद्रमा की राशि और नक्षत्र जैसे पंचांग तत्व दैनिक ज्योतिषीय विश्लेषण में भी देखे जाते हैं।
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पिठोरी अमावस्या की पूजा में सबसे महत्वपूर्ण क्या है?
कई बार लोग पूजा सामग्री और जटिल नियमों में इतने उलझ जाते हैं कि पूजा के मूल भाव को भूल जाते हैं।
पिठोरी अमावस्या का सबसे सुंदर संदेश परिवार के प्रति जिम्मेदारी, मातृशक्ति का सम्मान, संतान के कल्याण की कामना और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता में देखा जा सकता है।
महंगी सामग्री या बहुत बड़ी पूजा से अधिक महत्वपूर्ण श्रद्धा और सदाचार हैं।
अगर किसी परिवार में पारंपरिक विधि पीढ़ियों से चली आ रही है, तो उसका सम्मान करते हुए उसका पालन किया जा सकता है।
और यदि ऐसी कोई परंपरा नहीं है तो सरल पूजा भी पर्याप्त है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – Pithori Amavasya 2026 FAQ
पिठोरी अमावस्या 2026 कब है?
पिठोरी अमावस्या का व्रत गुरुवार, 10 सितंबर 2026 को है।
2026 में अमावस्या तिथि कब शुरू होगी?
नई दिल्ली पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 10 सितंबर को सुबह लगभग 10:33 बजे शुरू होती है।
अमावस्या तिथि कब समाप्त होगी?
नई दिल्ली के अनुसार यह 11 सितंबर 2026 की सुबह लगभग 8:56 बजे समाप्त होती है। स्थान के अनुसार पंचांग समय में मामूली अंतर संभव है।
पिठोरी अमावस्या किसकी पूजा के लिए प्रसिद्ध है?
पारंपरिक रूप से यह मातृशक्ति, 64 योगिनियों, सप्तमातृकाओं और संतान की मंगलकामना से जुड़ी मानी जाती है।
क्या पिठोरी अमावस्या पर पितरों का तर्पण किया जा सकता है?
अमावस्या पर पितृ स्मरण और तर्पण की परंपरा है। विस्तृत तर्पण विधि परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकती है।
क्या बिना व्रत के पूजा की जा सकती है?
हां। स्वास्थ्य या अन्य कारणों से कठोर व्रत संभव न हो तो श्रद्धापूर्वक सामान्य पूजा, प्रार्थना और दान किया जा सकता है।
क्या पिठोरी अमावस्या और भाद्रपद अमावस्या एक ही हैं?
अनेक क्षेत्रों में पिठोरी अमावस्या को भाद्रपद अमावस्या के संदर्भ में ही जाना जाता है। अमांत और पूर्णिमांत पंचांग के कारण महीने के नाम में क्षेत्रीय अंतर हो सकता है।
10 सितंबर और 11 सितंबर दोनों तारीखें क्यों दिखाई दे रही हैं?
क्योंकि अमावस्या तिथि 10 सितंबर को शुरू होकर 11 सितंबर की सुबह तक रहती है। पिठोरी व्रत 10 सितंबर को है, जबकि कुछ सूर्योदय आधारित अमावस्या कर्म 11 सितंबर को स्थानीय परंपरा के अनुसार किए जा सकते हैं।
विश्वसनीय स्रोत
तिथि और पंचांग संबंधी जानकारी के लिए इस लेख में मुख्य रूप से निम्न स्रोतों का संदर्भ लिया गया है:
Drik Panchang – New Delhi, September 2026
The Economic Times – Pithori Amavasya 2026 Date
धार्मिक परंपराओं में क्षेत्र, परिवार और संप्रदाय के अनुसार अंतर हो सकता है।
धार्मिक जानकारी संबंधी अस्वीकरण
इस लेख में दी गई पूजा-विधि, धार्मिक मान्यताएं, व्रत, योगिनी पूजा, पितृ तर्पण और दान से संबंधित जानकारी धार्मिक परंपराओं, पंचांग और सामान्य मान्यताओं पर आधारित है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में विधि अलग हो सकती है। यह लेख किसी निश्चित आध्यात्मिक परिणाम या चमत्कार की गारंटी नहीं देता। किसी विशेष वैदिक अनुष्ठान के लिए अपने परिवार के जानकार बुजुर्ग या योग्य आचार्य से सलाह लेना उचित है।
अंत में जाते-जाते
पिठोरी अमावस्या केवल एक व्रत या पंचांग की तारीख नहीं है। इसकी परंपराओं के भीतर परिवार, मातृत्व, संतान के प्रति जिम्मेदारी और अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता जैसे गहरे भाव दिखाई देते हैं।
10 सितंबर 2026 को पिठोरी अमावस्या के अवसर पर यदि आप विस्तृत पूजा नहीं भी कर पाएं, तो कुछ समय शांत होकर अपने इष्ट देव का स्मरण करें, अपने माता-पिता और पूर्वजों के प्रति आभार व्यक्त करें और सामर्थ्य के अनुसार किसी जरूरतमंद की सहायता करें।
सनातन धर्म और भारतीय धार्मिक परंपराओं से जुड़ी और रोचक जानकारियां पढ़ने के लिए The Rising Irish के Dharmik Shorts Gyan सेक्शन से भी जुड़े रहें।
आप सभी पर महादेव की कृपा बनी रहे। हर हर महादेव।
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