पूर्णिमा श्राद्ध 2026: पितृ पक्ष शुरू होने से ठीक पहले आने वाला पूर्णिमा श्राद्ध हर साल लोगों के बीच एक बड़ा भ्रम पैदा करता है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!2026 में भी सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है—
पितृ पक्ष 26 सितंबर से शुरू है या 27 सितंबर से?
इसका कारण यह है कि 26 सितंबर 2026, शनिवार को भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध है, जबकि प्रतिपदा श्राद्ध के साथ मुख्य पितृ पक्ष 27 सितंबर 2026 से शुरू माना जा रहा है।
यानी 26 सितंबर को होने वाला पूर्णिमा श्राद्ध महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसे सामान्य प्रतिपदा से अमावस्या तक चलने वाले मुख्य पितृ पक्ष के पहले दिन के रूप में समझना हमेशा सही नहीं होगा।
यही इस लेख का सबसे महत्वपूर्ण विषय है।
आज हम विस्तार से समझेंगे:
- पूर्णिमा श्राद्ध क्या होता है?
- 2026 में पूर्णिमा श्राद्ध कब है?
- किन पूर्वजों का श्राद्ध 26 सितंबर को किया जाता है?
- पूर्णिमा श्राद्ध और प्रतिपदा श्राद्ध में क्या अंतर है?
- श्राद्ध किस समय किया जाना चाहिए?
- अगर मृत्यु की तिथि पता न हो तो क्या करें?
- तर्पण, पिंडदान और भोजन दान में क्या अंतर है?
- और 27 सितंबर से शुरू होने वाले मुख्य पितृ पक्ष से इसका क्या संबंध है?
अगर आप 2026 के पूरे पितृ पक्ष की सभी तिथियां एक साथ देखना चाहते हैं तो पहले हमारा यह विस्तृत लेख भी पढ़ सकते हैं:
👉 पितृ पक्ष 2026 कब से शुरू है? श्राद्ध की सभी तिथियां, तर्पण विधि और नियम
पूर्णिमा श्राद्ध 2026 कब है?
2026 में पूर्णिमा श्राद्ध शनिवार, 26 सितंबर को किया जाएगा।
नई दिल्ली आधारित पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा तिथि:
25 सितंबर 2026 रात 11:06 बजे शुरू
और
26 सितंबर 2026 रात 10:18 बजे समाप्त
होती है।
Drik Panchang भी 26 सितंबर को Bhadrapada Purnima और Purnima Shraddha दर्शाता है।
अपने शहर के अनुसार तिथि और समय देखने के लिए:
👉 Drik Panchang पर 26 सितंबर 2026 की पूर्णिमा देखें
ध्यान रखें कि पंचांग का exact समय location के अनुसार बदल सकता है।
इसीलिए अगर आप विधिवत श्राद्ध करने जा रहे हैं तो अपने शहर का पंचांग जरूर देखें।
सबसे बड़ा भ्रम: पितृ पक्ष 26 सितंबर से है या 27 सितंबर से?
2026 में यह सवाल काफी महत्वपूर्ण है।
26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध है।
लेकिन प्रतिपदा श्राद्ध:
27 सितंबर 2026, रविवार
को है।
मुख्य महालय या पितृ पक्ष की तिथि-श्रृंखला सामान्य रूप से प्रतिपदा से आगे बढ़ती है।
इसलिए इसे आसान भाषा में ऐसे समझें:
26 सितंबर — पूर्णिमा श्राद्ध
27 सितंबर — प्रतिपदा श्राद्ध और मुख्य पितृ पक्ष की शुरुआत
इसी वजह से कई calendars और websites 26 सितंबर से shraddha observance दिखाती हैं, जबकि कुछ 27 सितंबर को Pitru Paksha का formal start बताती हैं।
यह contradiction कम और terminology का फर्क ज्यादा है।
अगर आप इसी confusion को विस्तार से समझना चाहते हैं तो हमारी पूरी Pitru Paksha guide पढ़ें:
👉 पितृ पक्ष 2026 की सभी श्राद्ध तिथियां और नियम
पूर्णिमा श्राद्ध क्या होता है?
भारतीय धार्मिक परंपरा में श्राद्ध दिवंगत पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करने से जुड़ा कर्म माना जाता है।
श्राद्ध का संबंध केवल भोजन कराने से नहीं है।
इसमें broadly शामिल हो सकते हैं:
- पूर्वजों का स्मरण
- तर्पण
- पिंडदान
- भोजन दान
- ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन
- पशु-पक्षियों को अन्न
- परिवार के दिवंगत सदस्यों के प्रति कृतज्ञता
पूर्णिमा श्राद्ध विशेष रूप से भाद्रपद पूर्णिमा से जुड़ा होता है।
यह मुख्य पितृ पक्ष शुरू होने से ठीक पहले आता है।
लेकिन यहां एक जरूरी बात समझें—
हर दिवंगत पूर्वज का श्राद्ध 26 सितंबर को नहीं किया जाता।
श्राद्ध की तिथि सामान्य रूप से मृत्यु की चंद्र तिथि के आधार पर निर्धारित होती है।
26 सितंबर को किनका श्राद्ध किया जाता है?
यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
सामान्य परंपरा में पूर्णिमा श्राद्ध उन पूर्वजों से जोड़ा जाता है जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि में हुई हो।
लेकिन इस विषय में अलग-अलग धार्मिक परंपराओं और पंचांग पद्धतियों में थोड़ी भिन्न व्याख्या मिल सकती है।
कुछ पंचांग sources यह भी उल्लेख करते हैं कि पूर्णिमा तिथि में दिवंगत व्यक्ति का महालय श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या पर भी किया जा सकता है।
इसी कारण अगर आपके परिवार में किसी पूर्वज की मृत्यु पूर्णिमा को हुई थी, तो केवल internet article के आधार पर विधि तय करने के बजाय अपने परिवार की परंपरा या जानकार पुरोहित से पुष्टि करना बेहतर होगा।
यह बात महत्वपूर्ण है क्योंकि:
श्राद्ध तिथि = English calendar date नहीं।
बल्कि:
श्राद्ध तिथि = हिंदू चंद्र तिथि।
उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति का निधन किसी वर्ष 5 अक्टूबर को हुआ था, लेकिन उस दिन पूर्णिमा थी, तो श्राद्ध की गणना सामान्यतः पूर्णिमा तिथि से जुड़ी होगी, केवल 5 अक्टूबर तारीख से नहीं।
मृत्यु की सही तिथि कैसे पहचानें?
बहुत से परिवारों में English date याद रहती है, लेकिन lunar tithi नहीं।
ऐसे में तीन तरीके उपयोगी हो सकते हैं।
1. पुराने पंचांग से तिथि देखें
जिस वर्ष और तारीख को निधन हुआ था, उस दिन की हिंदू तिथि check की जा सकती है।
2. परिवार के बुजुर्गों से पूछें
पुरानी पीढ़ी कई बार कहती है:
“उनका निधन अष्टमी को हुआ था।”
या
“पूर्णिमा के दिन हुआ था।”
ऐसी जानकारी बहुत उपयोगी हो सकती है।
3. पुरोहित से calculation कराएं
अगर date और approximate time मौजूद है तो संबंधित चंद्र तिथि निकाली जा सकती है।
अगर मृत्यु की तिथि बिल्कुल ज्ञात नहीं है तो आगे इसी article में उसका भी समाधान दिया गया है।
श्राद्ध में अपराह्न काल का महत्व क्यों है?
श्राद्ध कर्म की परंपरा में दोपहर के बाद का अपराह्न काल महत्वपूर्ण माना जाता है।
Drik Panchang अलग-अलग श्राद्ध तिथियों पर:
- कुतुप मुहूर्त
- रौहिण मुहूर्त
- अपराह्न काल
बताता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि पूरे भारत में एक ही clock time लागू होगा।
उदाहरण के लिए अलग-अलग शहरों में sunrise और local solar calculations अलग होने के कारण मुहूर्त भी बदल सकता है।
इसलिए:
दिल्ली का मुहूर्त Mathura, Mumbai, Kolkata या Chennai के लिए automatically exact नहीं माना जाना चाहिए।
अपने शहर के अनुसार पूर्णिमा श्राद्ध समय देखने के लिए:
👉 Drik Panchang Purnima Shraddha
कुतुप मुहूर्त क्या होता है?
श्राद्ध से जुड़े पंचांग में आपको “कुतुप मुहूर्त” शब्द दिखाई दे सकता है।
परंपरागत श्राद्ध विधि में इसे महत्वपूर्ण समयों में से एक माना जाता है।
इसके बाद रौहिण मुहूर्त और अपराह्न काल भी बताया जाता है।
लेकिन आम व्यक्ति के लिए सबसे practical बात यह है कि—
यदि घर में विधिवत श्राद्ध कराया जा रहा है तो local priest से शहर के अनुसार समय पहले ही confirm कर लें।
Internet पर किसी दूसरे शहर के screenshot को अपना मुहूर्त न मानें।
पूर्णिमा श्राद्ध की सामान्य विधि कैसे समझें?
श्राद्ध की विस्तृत विधि संप्रदाय, क्षेत्र और पारिवारिक परंपरा के अनुसार बदल सकती है।
इसलिए यहां किसी एक complex विधि को “पूरे भारत की एकमात्र सही विधि” कहना उचित नहीं होगा।
फिर भी सामान्य रूप से प्रक्रिया को इस तरह समझा जा सकता है।
1. स्नान और स्वच्छता
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं।
घर में जहां श्राद्ध कर्म होना हो, वहां साफ-सफाई रखें।
2. संकल्प
जिस पूर्वज के लिए श्राद्ध किया जा रहा है, उनका स्मरण किया जाता है।
अगर नाम और गोत्र पता हो तो पारिवारिक परंपरा के अनुसार उनका उच्चारण किया जा सकता है।
3. तर्पण
जल अर्पित करते हुए पितरों का स्मरण करना तर्पण से जुड़ी प्रमुख परंपराओं में है।
इसमें कई जगह:
- जल
- काले तिल
- कुश
का उपयोग किया जाता है।
तर्पण और पिंडदान एक ही चीज नहीं हैं।
इन दोनों का अंतर समझने के लिए पढ़ें:
👉 तर्पण और पिंडदान में क्या अंतर है?
4. पिंडदान
कुछ पारिवारिक या धार्मिक परंपराओं में पिंड अर्पित किए जाते हैं।
इसके लिए चावल, तिल आदि का उपयोग किया जा सकता है।
विधि अलग-अलग परंपरा में भिन्न होती है।
5. भोजन
श्राद्ध में भोजन का विशेष स्थान है।
परिवार की परंपरा के अनुसार ब्राह्मण, जरूरतमंद या अन्य व्यक्ति को भोजन कराया जा सकता है।
6. जीवों के लिए अन्न
कई क्षेत्रों में:
- गाय
- कौवा
- कुत्ता
और अन्य जीवों के लिए भी भोजन निकाला जाता है।
लेकिन इसके पीछे केवल “कौवा आया तो पितर खुश” जैसी simplistic व्याख्या करना सही नहीं है।
इस पर हमने अलग से विस्तृत लेख लिखा है:
👉 श्राद्ध में कौवा, गाय और कुत्ते को भोजन क्यों कराया जाता है?
7. दान
श्राद्ध में अपनी क्षमता के अनुसार दान किया जा सकता है।
उदाहरण:
- भोजन
- अनाज
- वस्त्र
- फल
- जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता
श्रद्धा और क्षमता दोनों महत्वपूर्ण हैं।
क्या बिना पंडित के श्राद्ध किया जा सकता है?
यह सवाल बहुत लोग पूछते हैं।
अगर आपके परिवार में विस्तृत वैदिक या पारंपरिक श्राद्ध विधि होती है तो योग्य पुरोहित से कराना practical हो सकता है।
लेकिन कोई व्यक्ति परिस्थितियों के कारण विस्तृत कर्म न कर पाए तो पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करना, जल अर्पित करना, जरूरतमंद को भोजन देना और दान करना भी meaningful remembrance हो सकता है।
यहां डरने की जरूरत नहीं है।
श्राद्ध को इस तरह न देखें कि:
“एक मंत्र गलत हो गया तो अनिष्ट हो जाएगा।”
धार्मिक कर्म में श्रद्धा, मर्यादा और sincerity महत्वपूर्ण है।
अगर पिता जीवित हैं तो क्या श्राद्ध कर सकते हैं?
यह सवाल भी अक्सर पूछा जाता है।
परिवार में दादा-दादी, परदादा-परदादी या अन्य पूर्वजों का निधन हो चुका हो सकता है जबकि पिता जीवित हों।
श्राद्ध की eligibility और विधि परिवार की परंपरा और शास्त्रीय व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
इसलिए अपने परिवार में कौन व्यक्ति श्राद्ध करेगा, इसका निर्णय local tradition और जानकार पुरोहित से समझना बेहतर है।
इंटरनेट पर एक-line universal rule मान लेना सही नहीं होगा।
अगर मृत्यु की तिथि पता नहीं है तो क्या करें?
अगर किसी पूर्वज की मृत्यु की चंद्र तिथि पता नहीं है तो परंपरागत रूप से सर्वपितृ अमावस्या विशेष महत्व रखती है।
2026 में सर्वपितृ अमावस्या:
10 अक्टूबर 2026, शनिवार
को है।
यह दिन ऐसे पूर्वजों के स्मरण और श्राद्ध से भी जोड़ा जाता है जिनकी exact मृत्यु तिथि ज्ञात न हो।
इसलिए अगर तिथि को लेकर confusion है तो घबराने की बजाय पहले family records और बुजुर्गों से जानकारी जुटाएं।
और अगर फिर भी तिथि न मिले तो सर्वपितृ अमावस्या के संदर्भ में अपने परिवार की परंपरा देखें।
क्या पूर्णिमा श्राद्ध और पूर्णिमा व्रत एक ही चीज हैं?
नहीं।
26 सितंबर 2026 को भाद्रपद पूर्णिमा है।
इस दिन:
भाद्रपद पूर्णिमा व्रत
और
पूर्णिमा श्राद्ध
दो अलग धार्मिक संदर्भ हैं।
पूर्णिमा व्रत भगवान विष्णु, सत्यनारायण कथा या स्थानीय धार्मिक परंपराओं से जुड़ सकता है।
जबकि पूर्णिमा श्राद्ध का संबंध पूर्वजों के स्मरण और पितृ कर्म से है।
दोनों एक ही तिथि पर हो सकते हैं लेकिन दोनों का उद्देश्य अलग है।
क्या 26 सितंबर को ही पूरा पितृ पक्ष शुरू हो जाएगा?
इसे थोड़ा सावधानी से समझें।
26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध है।
27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध है।
मुख्य पितृ पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक चलने वाली श्रृंखला 27 सितंबर से देखी जाती है।
इसीलिए practical calendar में:
26 सितंबर – पूर्णिमा श्राद्ध
27 सितंबर – प्रतिपदा श्राद्ध
10 अक्टूबर – सर्वपितृ अमावस्या
तीनों तारीखें अलग-अलग याद रखना बेहतर है।
2026 के शुरुआती श्राद्ध दिनों का क्रम
पितृ पक्ष की शुरुआत के आसपास calendar broadly इस तरह रहेगा:
26 सितंबर — पूर्णिमा श्राद्ध
27 सितंबर — प्रतिपदा श्राद्ध
28 सितंबर — द्वितीया श्राद्ध
29 सितंबर — तृतीया श्राद्ध / महाभरणी से संबंधित observance
इसके बाद आगे अलग-अलग तिथियों के श्राद्ध आते हैं।
पूरी सूची यहां देखें:
👉 पितृ पक्ष 2026 श्राद्ध कैलेंडर
पूर्णिमा श्राद्ध में क्या दान करें?
दान दिखावे के लिए नहीं होना चाहिए।
अपनी क्षमता के अनुसार उपयोगी वस्तु देना बेहतर है।
आप इनमें से कुछ चुन सकते हैं:
अन्न दान: चावल, आटा, दाल या तैयार भोजन।
फल: जरूरतमंद व्यक्ति को।
वस्त्र: साफ और उपयोगी वस्त्र।
पानी: यात्रियों या जरूरतमंदों के लिए।
शिक्षा सहायता: किसी जरूरतमंद बच्चे की किताब या फीस में सहयोग।
वृद्ध सहायता: किसी जरूरतमंद बुजुर्ग को भोजन या जरूरी सामान।
धार्मिक कर्म का एक practical अर्थ यह भी हो सकता है कि हमारे पूर्वजों की स्मृति किसी जरूरतमंद के जीवन में उपयोगी बने।
क्या श्राद्ध के दिन शिव पूजा कर सकते हैं?
हां, सामान्य भगवान शिव पूजा और पितृ कर्म को अलग-अलग समझना चाहिए।
पितृ पक्ष का अर्थ भगवान की पूजा बंद करना नहीं है।
रोज की पूजा सामान्य रूप से जारी रखी जा सकती है।
लेकिन देव पूजा को श्राद्ध या तर्पण का substitute नहीं समझना चाहिए।
इस विषय पर विस्तृत guide पढ़ें:
👉 पितृ पक्ष में शिव पूजा कैसे करें? क्या करें और क्या न करें
क्या हर परेशानी पितृ दोष के कारण होती है?
नहीं।
यह बहुत जरूरी बात है।
घर में बीमारी हो गई।
काम रुक गया।
शादी में देरी हुई।
पैसा कम है।
परिवार में विवाद है।
इनमें से किसी एक घटना को देखकर तुरंत यह कह देना कि “पितृ दोष है” उचित नहीं है।
ज्योतिषीय परंपरा में भी कुंडली को समग्र रूप से देखने की बात की जाती है।
इसलिए डर के आधार पर महंगी पूजा कराने का निर्णय न लें।
अगर आप इस विषय को विस्तार से समझना चाहते हैं तो हमारा article पढ़ें:
👉 पितृ दोष क्या होता है? कुंडली में कैसे पहचानें, कारण और उपाय
और अपनी कुंडली के भावों को समझने के लिए:
👉 कुंडली के 12 भाव क्या बताते हैं?
भी पढ़ सकते हैं।
श्राद्ध में सबसे महत्वपूर्ण चीज क्या है?
श्राद्ध के नाम से कई बार बहुत लंबी सामग्री lists circulate होती हैं।
लेकिन इसके मूल भाव को भूलना नहीं चाहिए।
श्राद्ध का संबंध “श्रद्धा” से जोड़ा जाता है।
इसका अर्थ है—
अपने उन पूर्वजों को याद करना जिनके कारण हमारा परिवार और हमारी पीढ़ी यहां तक पहुंची।
इसके तीन practical रूप समझे जा सकते हैं:
स्मरण
उनका नाम लें, तस्वीर देखें और परिवार में उनके बारे में बात करें।
कृतज्ञता
उन्होंने जो दिया उसे स्वीकार करें।
सेवा
उनके नाम पर किसी जरूरतमंद की मदद करें।
यह approach धार्मिक कर्म को केवल ritual नहीं रहने देता बल्कि family memory में बदल देता है।
इस पितृ पक्ष एक Family Record भी बनाएं
यह एक ऐसा काम है जिसे शायद बहुत कम लोग करते हैं।
घर के बुजुर्गों के पास बैठकर लिखें:
- दादा-दादी का पूरा नाम
- परदादा-परदादी का नाम
- मूल गांव
- उनका काम
- उनकी कोई खास कहानी
- उनकी मृत्यु की तिथि
- परिवार की पुरानी परंपराएं
इसे diary या digital file में save कर दें।
क्योंकि कई परिवारों में दो-तीन पीढ़ियों बाद अपने ही पूर्वजों के नाम और तिथियां भूल जाती हैं।
इस पितृ पक्ष केवल श्राद्ध ही नहीं—
अपने परिवार का इतिहास भी बचाएं।
पूर्णिमा श्राद्ध 2026 FAQ
पूर्णिमा श्राद्ध 2026 कब है?
2026 में पूर्णिमा श्राद्ध शनिवार, 26 सितंबर को है।
पूर्णिमा तिथि कब शुरू होगी?
नई दिल्ली आधारित पंचांग के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा 25 सितंबर रात 11:06 बजे शुरू होकर 26 सितंबर रात 10:18 बजे तक रहेगी। स्थान के अनुसार समय बदल सकता है।
पितृ पक्ष 26 सितंबर से शुरू है या 27 सितंबर से?
26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध है, जबकि प्रतिपदा श्राद्ध 27 सितंबर को है। मुख्य पितृ पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक वाली श्रृंखला 27 सितंबर से मानी जा सकती है।
पूर्णिमा श्राद्ध किनके लिए किया जाता है?
सामान्य परंपरा में इसे पूर्णिमा तिथि में दिवंगत पूर्वजों से जोड़ा जाता है। परिवार की specific परंपरा के लिए स्थानीय पुरोहित से पुष्टि करें।
श्राद्ध सुबह करें या दोपहर?
श्राद्ध कर्म में अपराह्न काल को विशेष महत्व दिया जाता है। exact कुतुप, रौहिण और अपराह्न समय शहर के अनुसार पंचांग में देखें।
अगर मृत्यु की तिथि नहीं पता तो क्या करें?
परंपरागत रूप से सर्वपितृ अमावस्या को ऐसे पूर्वजों के श्राद्ध के लिए विशेष माना जाता है जिनकी तिथि ज्ञात न हो। 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को है।
क्या श्राद्ध में कौवे को भोजन देना जरूरी है?
कई क्षेत्रों में कौवा, गाय और कुत्ते के लिए भोजन निकालने की परंपरा है। इसे डर या अशुभ संकेत से जोड़ने के बजाय दान और जीवों के प्रति करुणा के भाव से समझना बेहतर है।
क्या पितृ पक्ष में भगवान की पूजा कर सकते हैं?
हां। सामान्य दैनिक देव पूजा जारी रखी जा सकती है। पितृ कर्म और देव पूजा का उद्देश्य अलग है।
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जरूरी डिस्क्लेमर
यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पंचांग और प्रचलित हिंदू परंपराओं की सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है।
श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की विधि अलग-अलग परिवारों, क्षेत्रों और संप्रदायों में भिन्न हो सकती है।
किसी विशेष धार्मिक कर्म के लिए अपने परिवार की परंपरा और योग्य पुरोहित का मार्गदर्शन लेना बेहतर है।
पंचांग के exact समय location के अनुसार बदल सकते हैं।
अंत में जाते-जाते
26 सितंबर 2026 का पूर्णिमा श्राद्ध केवल यह तय करने का दिन नहीं है कि कौन-सी सामग्री रखनी है और कौन-सा मुहूर्त देखना है।
यह एक मौका है अपने परिवार की उस पीढ़ी को याद करने का जो अब हमारे बीच नहीं है।
किसी पुराने album में उनकी तस्वीर खोजिए।
घर के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति से उनके बारे में एक कहानी पूछिए।
उनकी मृत्यु की सही तिथि कहीं लिखकर सुरक्षित रखिए।
और उनके नाम पर किसी जरूरतमंद को भोजन कराइए।
2026 में:
26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध,
27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध,
और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या है।
इन तिथियों को केवल calendar की तारीखें न बनने दें।
इन्हें अपने परिवार की स्मृतियों से जोड़ें।
क्योंकि आने वाली पीढ़ी अपने पूर्वजों को उतना ही जान पाएगी, जितना हम आज उनके बारे में सुरक्षित रखेंगे।