देश में तेजी से बढ़ रहे Digital Arrest Scam के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI ने अब तक की बड़ी कार्रवाइयों में से एक को अंजाम दिया है। CBI ने संगठित साइबर अपराध और डिजिटल अरेस्ट गिरोहों के खिलाफ Operation Chakra-VI के तहत देश के 20 राज्यों में एक साथ 89 ठिकानों पर तलाशी अभियान चलाया। इस कार्रवाई के शुरुआती चरण में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था, जबकि 6 सितंबर 2026 को CBI ने पांच और आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। इसके साथ ही इन तीन मामलों में गिरफ्तार आरोपियों की कुल संख्या बढ़कर 8 हो गई है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!यह कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जांच में सामने आए तीन प्रमुख मामलों में पीड़ितों से कथित तौर पर कुल ₹42.36 करोड़ की ठगी की गई थी। इन मामलों में पीड़ितों को एक से तीन महीने तक कथित तौर पर “डिजिटल अरेस्ट” में रखा गया और पुलिस या अन्य सरकारी अधिकारियों का रूप धारण करके उनसे करोड़ों रुपये ट्रांसफर करवाए गए।
CBI की जांच केवल ठगी करने वाले लोगों तक सीमित नहीं है। एजेंसी का ध्यान उस पूरे नेटवर्क पर है जो ठगी की रकम को अलग-अलग बैंक खातों में भेजने, उसकी लेयरिंग करने और पैसों के वास्तविक स्रोत को छिपाने में कथित तौर पर मदद करता था।
आइए जानते हैं कि CBI की Operation Chakra-VI कार्रवाई क्या है, डिजिटल अरेस्ट स्कैम कैसे काम करता है, 20 राज्यों में 89 जगहों पर क्या कार्रवाई हुई, किन मामलों में करोड़ों रुपये की ठगी हुई और 8 गिरफ्तारियों के बाद जांच किस दिशा में आगे बढ़ रही है।
CBI ने 20 राज्यों में क्यों चलाया इतना बड़ा तलाशी अभियान?
4 सितंबर 2026 को CBI ने डिजिटल अरेस्ट से जुड़े तीन प्रमुख साइबर अपराध मामलों की जांच के तहत देशभर में एक साथ तलाशी अभियान चलाया। यह कार्रवाई Operation Chakra-VI के तहत की गई। जांच एजेंसी ने कुल 89 स्थानों पर तलाशी ली, जो 20 राज्यों में फैले हुए थे।
CBI का मुख्य उद्देश्य केवल कुछ बैंक खातों या आरोपियों तक पहुंचना नहीं था, बल्कि डिजिटल अरेस्ट के पीछे काम करने वाले व्यापक साइबर अपराध नेटवर्क का पता लगाना था।
ऐसे मामलों में साइबर अपराधी अक्सर अलग-अलग लोगों को अलग-अलग भूमिका देते हैं। कुछ लोग पीड़ितों से संपर्क करके खुद को पुलिस अधिकारी, CBI अधिकारी, सरकारी अधिकारी या अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसी का कर्मचारी बताते हैं। इसके बाद कुछ लोग बैंक खातों की व्यवस्था करते हैं, कुछ रकम को एक खाते से दूसरे खाते में भेजते हैं और कुछ कथित तौर पर नकद निकालने या पैसों की परतें बनाने में मदद करते हैं।
CBI की कार्रवाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इसी money trail को समझना है।
तलाशी के दौरान जांच एजेंसी ने बैंकिंग दस्तावेज, बैंक खातों से संबंधित रिकॉर्ड, डिजिटल डिवाइस और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जब्त किए। इन डिजिटल और वित्तीय सबूतों की फॉरेंसिक जांच के जरिए नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है।
क्या है Operation Chakra-VI?
Operation Chakra-VI CBI की संगठित साइबर अपराध नेटवर्क के खिलाफ चल रही व्यापक कार्रवाई का हिस्सा है। इस ऑपरेशन के तहत एजेंसी ऐसे साइबर अपराध नेटवर्क की जांच कर रही है जो डिजिटल अरेस्ट, ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी और ठगी की रकम को अलग-अलग खातों में घुमाने जैसे तरीकों से जुड़े हुए हैं।
डिजिटल अरेस्ट स्कैम में अपराधी तकनीक और मनोवैज्ञानिक दबाव दोनों का इस्तेमाल करते हैं।
पीड़ित को अचानक फोन या वीडियो कॉल आता है। कॉल करने वाला व्यक्ति खुद को पुलिस, CBI, ED, TRAI, कोर्ट या किसी दूसरी सरकारी संस्था का अधिकारी बताता है। इसके बाद पीड़ित को बताया जाता है कि उसके नाम से कोई आपराधिक मामला सामने आया है या उसके बैंक खाते का इस्तेमाल किसी अवैध गतिविधि में हुआ है।
इसके बाद अपराधी पीड़ित को डराते हैं कि अगर उसने उनकी बात नहीं मानी तो उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
कई मामलों में पीड़ित को वीडियो कॉल पर बने रहने के लिए कहा जाता है। उसे किसी से बात करने, घर से बाहर जाने या परिवार के सदस्यों को जानकारी देने से रोका जाता है। इसी स्थिति को अपराधी “Digital Arrest” जैसा नाम देकर पेश करते हैं।
असल में यह कोई कानूनी गिरफ्तारी नहीं होती।
डिजिटल अरेस्ट वास्तव में क्या होता है?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के कानून में वीडियो कॉल या फोन कॉल के माध्यम से किसी व्यक्ति को “डिजिटल अरेस्ट” करने की कोई वैध प्रक्रिया नहीं है।
अपराधी इसी डर और भ्रम का फायदा उठाते हैं।
वे पीड़ित को बताते हैं कि वह जांच के दायरे में है और उसकी निगरानी की जा रही है। इसके बाद उससे बैंक खाते की जानकारी, OTP, पहचान संबंधी दस्तावेज या पैसे ट्रांसफर करने के लिए कहा जा सकता है।
कुछ मामलों में पीड़ितों से यह भी कहा जाता है कि उनके खाते की “जांच” के लिए पैसे किसी विशेष बैंक खाते में जमा करने होंगे। अपराधी दावा करते हैं कि जांच पूरी होने के बाद पैसा वापस कर दिया जाएगा।
लेकिन पैसा भेजने के बाद वह आमतौर पर कई खातों में ट्रांसफर कर दिया जाता है।
यही कारण है कि CBI की मौजूदा कार्रवाई में receiving, layering और dispersing of fraud proceeds जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
तीन मामलों में ₹42.36 करोड़ की कथित ठगी
CBI की इस कार्रवाई के केंद्र में तीन प्रमुख डिजिटल अरेस्ट मामले हैं। इन तीन मामलों में कथित तौर पर कुल ₹42.36 करोड़ की ठगी हुई।
इनमें गुजरात, राजस्थान से जुड़े BITS Pilani मामले और कर्नाटक का मामला शामिल है।
गुजरात में करीब ₹19.24 करोड़ की ठगी
पहला मामला गुजरात का है।
CBI के अनुसार, इस मामले में पीड़ित को करीब तीन महीने तक डिजिटल अरेस्ट के नाम पर मानसिक दबाव में रखा गया। साइबर अपराधियों ने कथित तौर पर खुद को पुलिस अधिकारी बताया और पीड़ित से लगभग ₹19.24 करोड़ की ठगी की।
तीन महीने तक चलने वाली ऐसी धोखाधड़ी यह बताती है कि डिजिटल अरेस्ट स्कैम केवल कुछ मिनटों या घंटों की ठगी नहीं रह गया है। अपराधी अब लंबे समय तक पीड़ित को मानसिक रूप से नियंत्रित रखने की कोशिश कर रहे हैं।
BITS Pilani से जुड़े मामले में ₹7.67 करोड़
दूसरा मामला राजस्थान के BITS Pilani से जुड़ा बताया गया है।
इस मामले में भी पीड़ित को कथित तौर पर लगभग तीन महीने तक डिजिटल अरेस्ट में रखा गया और पुलिस अधिकारी बनकर उससे करीब ₹7.67 करोड़ की ठगी की गई।
यह मामला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि अपराधियों ने सरकारी अधिकारी होने का झूठा भरोसा पैदा करके पीड़ित को लंबे समय तक अपने नियंत्रण में रखा।
कर्नाटक में ₹15.45 करोड़ की कथित ठगी
तीसरा मामला कर्नाटक से जुड़ा है।
इसमें पीड़ित को करीब एक महीने तक डिजिटल अरेस्ट में रखने का आरोप है। अपराधियों ने कथित तौर पर उससे ₹15.45 करोड़ की ठगी की।
इन तीनों मामलों की रकम को जोड़ने पर कुल कथित धोखाधड़ी ₹42.36 करोड़ तक पहुंचती है।
शुरुआती कार्रवाई में तीन आरोपी गिरफ्तार
4 सितंबर की तलाशी कार्रवाई के दौरान CBI ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया था।
जांच के अनुसार इन लोगों की भूमिका कथित तौर पर ठगी की रकम को प्राप्त करने, अलग-अलग खातों में भेजने और उसके वास्तविक स्रोत को छिपाने से जुड़ी थी।
हरियाणा का आकाश
CBI के अनुसार, हरियाणा निवासी आकाश के बैंक खाते में कथित तौर पर ₹1.95 करोड़ की ठगी की रकम आई थी।
जांच में यह आरोप सामने आया कि खाते को कथित तौर पर इसी उद्देश्य से खोला गया था और रकम आने के बाद उसी दिन उसे दूसरे बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिया गया।
इस तरह के लेन-देन जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि इनके जरिए ठगी की रकम का रास्ता यानी money trail पता लगाया जा सकता है।
कोलकाता का राजा कर्मकार
दूसरे आरोपी राजा कर्मकार, जो कोलकाता से संबंधित बताया गया है, पर आरोप है कि उसकी फर्म के बैंक खाते में लगभग ₹1.5 करोड़ की ठगी की रकम प्राप्त हुई।
CBI इस बात की जांच कर रही है कि इस रकम को किस तरह आगे ट्रांसफर किया गया और इसमें अन्य लोग कौन-कौन शामिल थे।
ज्योति रानी
तीसरी आरोपी ज्योति रानी पर आरोप है कि उसके बैंक खाते में भी ठगी की रकम का एक हिस्सा आया।
जांच के अनुसार उसने कथित तौर पर रकम का कुछ हिस्सा नकद निकाला और बाकी पैसा दूसरे खातों में ट्रांसफर किया। इससे जांच एजेंसी को संदेह है कि रकम के वास्तविक स्रोत को छिपाने की कोशिश की गई।
6 सितंबर को 5 और गिरफ्तारियां
CBI की जांच यहीं नहीं रुकी।
6 सितंबर 2026 को CBI ने डिजिटल अरेस्ट से जुड़े इन्हीं तीन मामलों में पांच और आरोपियों को गिरफ्तार किया। इसके साथ ही इन मामलों में कुल गिरफ्तारियों की संख्या बढ़कर 8 हो गई।
CBI के अनुसार, इन पांच आरोपियों की कथित भूमिका भी ठगी की रकम को प्राप्त करने, उसे अलग-अलग खातों में भेजने और उसके trail को छिपाने से संबंधित थी।
रिपोर्टों के अनुसार गिरफ्तार किए गए लोगों में संकते बस्तवार और पंकज दमाड़े भी शामिल हैं, जो मध्य प्रदेश के इटारसी से बताए गए हैं। CBI का आरोप है कि उन्होंने एक बैंक खाते की व्यवस्था की, उसमें डिजिटल अरेस्ट से प्राप्त रकम हासिल की और बाद में रकम को अलग-अलग जगहों पर भेजने में भूमिका निभाई।
अन्य गिरफ्तारियों में कथित तौर पर ऐसे लोग भी शामिल हैं जिन पर बैंक खाते और तकनीकी माध्यमों के जरिए ठगी की रकम को नियंत्रित करने में भूमिका निभाने का आरोप है।
जांच अभी जारी है और CBI इस नेटवर्क के अन्य सदस्यों की पहचान करने की कोशिश कर रही है।
साइबर अपराधी बैंक खातों का कैसे इस्तेमाल करते हैं?
डिजिटल अरेस्ट स्कैम में केवल फोन करने वाले व्यक्ति की भूमिका नहीं होती।
इसके पीछे कई स्तरों पर काम करने वाला नेटवर्क हो सकता है।
सबसे पहले पीड़ित को फोन किया जाता है। फिर उसे डराया जाता है। जब पीड़ित पैसे देने के लिए तैयार हो जाता है, तो उसे एक बैंक खाते में रकम भेजने के लिए कहा जाता है।
लेकिन जरूरी नहीं कि वह खाता सीधे मुख्य अपराधी का हो।
रकम किसी दूसरे व्यक्ति के खाते में जा सकती है। वहां से उसे तीसरे खाते में भेजा जा सकता है। फिर किसी अन्य खाते में ट्रांसफर किया जा सकता है या नकद निकाला जा सकता है।
इस प्रक्रिया को सामान्य तौर पर layering कहा जाता है।
जितनी ज्यादा परतें बनाई जाती हैं, उतना ही पैसों का वास्तविक स्रोत पता लगाना कठिन हो सकता है।
इसीलिए CBI की जांच में केवल कॉल करने वाले साइबर अपराधियों के बजाय बैंक खातों और money trail की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है।
डिजिटल अरेस्ट स्कैम में APK का भी इस्तेमाल
6 सितंबर को सामने आए अपडेट में जांच से एक और चिंताजनक पहलू सामने आया।
रिपोर्टों के अनुसार, कुछ आरोपियों ने कथित तौर पर account holders के मोबाइल फोन में APK फाइल इंस्टॉल की थी। इसके जरिए बैंक के SMS alerts को इंटरसेप्ट करने और बैंक खाते को चोरी-छिपे ऑपरेट करने का आरोप है।
यह साइबर सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
APK यानी Android application package फाइल के जरिए मोबाइल में ऐसा ऐप इंस्टॉल किया जा सकता है जो सामान्य ऐप जैसा दिखाई दे, लेकिन उसके पीछे खतरनाक गतिविधियां हो सकती हैं।
अगर कोई व्यक्ति किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर APK इंस्टॉल करता है, तो उसके मोबाइल की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
विशेष रूप से बैंकिंग ऐप, SMS, OTP और दूसरे संवेदनशील डेटा से जुड़े खतरे बढ़ सकते हैं।
इसीलिए अनजान WhatsApp लिंक, SMS लिंक या किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा भेजी गई APK फाइल को इंस्टॉल नहीं करना चाहिए।
डिजिटल अरेस्ट स्कैम में लोग क्यों फंस जाते हैं?
यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है।
कई लोग सोचते हैं कि कोई समझदार व्यक्ति ऐसे स्कैम में कैसे फंस सकता है।
लेकिन डिजिटल अरेस्ट स्कैम का डिजाइन ही ऐसा होता है कि पीड़ित को सोचने का समय न मिले।
अपराधी एक साथ कई चीजों का इस्तेमाल करते हैं—
- सरकारी अधिकारी होने का दावा
- पुलिस की भाषा
- नकली दस्तावेज
- वीडियो कॉल
- फर्जी केस नंबर
- गिरफ्तारी का डर
- बैंक खाते से जुड़े आरोप
- परिवार को बताने से रोकना
- लगातार फोन पर बने रहने का दबाव
जब व्यक्ति डर जाता है तो वह सामान्य परिस्थितियों की तरह निर्णय नहीं ले पाता।
यही इस साइबर अपराध की सबसे खतरनाक विशेषता है।
अगर कोई खुद को CBI या पुलिस अधिकारी बताकर फोन करे तो क्या करें?
सबसे पहले घबराएं नहीं।
अगर कोई फोन करके कहता है कि आप डिजिटल अरेस्ट में हैं, तो यह बेहद गंभीर चेतावनी है।
याद रखें कि कोई भी व्यक्ति केवल फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से आपको कानूनी तौर पर “डिजिटल अरेस्ट” नहीं कर सकता।
किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर पैसे ट्रांसफर न करें।
अपना OTP, UPI PIN, ATM PIN, बैंक पासवर्ड या इंटरनेट बैंकिंग जानकारी साझा न करें।
किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर कोई APK या remote-access application इंस्टॉल न करें।
अगर कॉल करने वाला आपको परिवार या पुलिस से बात करने से रोकता है, तो यह भी एक बड़ा red flag है।
ऐसी स्थिति में कॉल काटकर संबंधित सरकारी या बैंकिंग चैनल से स्वयं सत्यापन करें।
CBI की कार्रवाई से आम लोगों को क्या संदेश मिलता है?
Operation Chakra-VI यह दिखाता है कि डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराध अब केवल स्थानीय स्तर की समस्या नहीं रह गया है।
एक मामले में पीड़ित एक राज्य में हो सकता है, बैंक खाता दूसरे राज्य का हो सकता है और पैसे को तीसरे राज्य में भेजा जा सकता है।
इसी वजह से ऐसे मामलों में राज्यों के बीच समन्वय और केंद्रीय जांच एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
20 राज्यों में 89 स्थानों पर तलाशी इस बात का संकेत है कि जांच एजेंसी इस नेटवर्क को व्यापक स्तर पर देख रही है।
इसके अलावा Supreme Court ने भी डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराधों की गंभीरता को देखते हुए CBI को व्यापक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
क्या 8 गिरफ्तारियों के बाद मामला खत्म हो गया?
नहीं।
यह कार्रवाई जांच का एक महत्वपूर्ण चरण है, लेकिन जांच अभी जारी है।
CBI जब्त किए गए बैंकिंग दस्तावेजों, मोबाइल फोन, डिजिटल डिवाइस और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच कर रही है।
इस जांच से यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि—
- मुख्य साइबर अपराधी कौन हैं?
- पीड़ितों को फोन कौन करता था?
- फर्जी पुलिस या सरकारी अधिकारी बनने वाले लोग कौन थे?
- बैंक खाते किसने उपलब्ध कराए?
- ठगी की रकम किन-किन खातों में गई?
- पैसा किन राज्यों में पहुंचा?
- क्या इस नेटवर्क के तार विदेशों से भी जुड़े हैं?
- डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल किस तरह किया गया?
- और इस नेटवर्क में कितने लोग शामिल हैं?
इन सवालों के जवाब जांच आगे बढ़ने के साथ सामने आ सकते हैं।
Digital Arrest Scam से बचने के 10 आसान तरीके
1. फोन पर गिरफ्तारी की धमकी से न डरें
अगर कोई आपको फोन पर गिरफ्तार करने की धमकी दे रहा है, तो तुरंत पैसे भेजने की जरूरत नहीं है।
2. सरकारी अधिकारी की पहचान verify करें
सिर्फ वीडियो कॉल पर दिखाई देने वाली वर्दी या ID कार्ड पर भरोसा न करें।
3. OTP कभी साझा न करें
बैंक या किसी भी वित्तीय सेवा से संबंधित OTP किसी के साथ साझा न करें।
4. UPI PIN न बताएं
UPI PIN पैसे प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि भुगतान करने के लिए होता है।
5. अनजान APK इंस्टॉल न करें
WhatsApp, Telegram, SMS या किसी अन्य माध्यम से भेजी गई अज्ञात APK फाइल इंस्टॉल न करें।
6. Remote access ऐप से सावधान रहें
अगर कोई व्यक्ति आपके मोबाइल या कंप्यूटर का remote access मांगता है, तो बहुत सावधान रहें।
7. परिवार से बात करें
अगर कोई आपको कहता है कि किसी को फोन मत करना, तो यह बड़ा खतरे का संकेत है।
8. पैसे ट्रांसफर न करें
“जांच के लिए पैसे जमा करें” या “verification के लिए रकम भेजें” जैसी बातें सुनकर पैसे न भेजें।
9. सबूत सुरक्षित रखें
फोन नंबर, WhatsApp चैट, बैंक ट्रांजैक्शन, स्क्रीनशॉट और कॉल की जानकारी सुरक्षित रखें।
10. तुरंत शिकायत करें
अगर आपके साथ साइबर फ्रॉड हुआ है, तो जितनी जल्दी संभव हो साइबर अपराध की आधिकारिक व्यवस्था के माध्यम से शिकायत करें और बैंक को भी तुरंत सूचित करें।
CBI की कार्रवाई क्यों महत्वपूर्ण है?
CBI की यह कार्रवाई कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है।
पहला, इसने यह स्पष्ट किया है कि डिजिटल अरेस्ट स्कैम को गंभीर संगठित साइबर अपराध के रूप में देखा जा रहा है।
दूसरा, जांच सिर्फ पीड़ित से पैसे लेने वाले अंतिम व्यक्ति तक सीमित नहीं है। एजेंसी money trail और नेटवर्क के दूसरे हिस्सों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।
तीसरा, 89 स्थानों पर एक साथ तलाशी यह बताती है कि डिजिटल अपराधियों के नेटवर्क कई राज्यों में फैले हो सकते हैं।
चौथा, 6 सितंबर को पांच और गिरफ्तारियों के बाद कुल गिरफ्तारियां आठ तक पहुंचना बताता है कि शुरुआती कार्रवाई के बाद भी जांच तेजी से आगे बढ़ रही है।
आगे क्या हो सकता है?
CBI की जांच आगे बढ़ने के साथ और गिरफ्तारियां हो सकती हैं।
जांच एजेंसी डिजिटल डिवाइस, बैंक खातों और वित्तीय लेन-देन की फॉरेंसिक जांच के जरिए नेटवर्क के अन्य सदस्यों तक पहुंचने की कोशिश करेगी।
विशेष रूप से यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि तीनों मामलों की ठगी की रकम आखिरकार कहां गई और किन लोगों ने उसे नियंत्रित किया।
अगर जांच में किसी बड़े संगठित नेटवर्क या अंतरराज्यीय अथवा अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन का पता चलता है, तो कार्रवाई का दायरा और बढ़ सकता है।
इसलिए फिलहाल इस मामले को केवल तीन डिजिटल अरेस्ट मामलों की जांच के रूप में देखना सही नहीं होगा। यह कार्रवाई देश में बढ़ रहे संगठित साइबर अपराध के खिलाफ एक बड़े प्रयास का हिस्सा है।
निष्कर्ष
CBI का Operation Chakra-VI डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराध के खिलाफ एक महत्वपूर्ण कार्रवाई है। 20 राज्यों में 89 स्थानों पर तलाशी, तीन प्रमुख मामलों में ₹42.36 करोड़ की कथित ठगी और अब तक कुल आठ गिरफ्तारियां इस मामले की गंभीरता को दिखाती हैं।
सबसे जरूरी बात आम लोगों के लिए यह है कि “Digital Arrest” के नाम से डरकर किसी को पैसे न भेजें।
अगर कोई व्यक्ति पुलिस, CBI या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बनकर वीडियो कॉल करता है और गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे मांगता है, तो बेहद सावधान हो जाएं। किसी भी परिस्थिति में OTP, UPI PIN, बैंक पासवर्ड या संवेदनशील जानकारी साझा न करें और अनजान APK या मोबाइल एप्लिकेशन इंस्टॉल न करें।
आज साइबर अपराधी केवल तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, बल्कि लोगों के डर और भरोसे को भी हथियार बना रहे हैं। इसलिए डिजिटल सुरक्षा की पहली सीढ़ी है—घबराना नहीं, सत्यापन करना और जल्दबाजी में कोई वित्तीय निर्णय न लेना।
CBI की यह कार्रवाई ऐसे नेटवर्क के खिलाफ एक मजबूत संदेश है कि डिजिटल माध्यम से किए गए अपराधों का भी वित्तीय और तकनीकी trail छोड़ा जाता है और जांच एजेंसियां उस trail को पकड़कर अपराधियों तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं।
जांच अभी जारी है और आने वाले दिनों में इस नेटवर्क से जुड़े और नाम सामने आने की संभावना है। फिलहाल 7 सितंबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस Operation Chakra-VI कार्रवाई से जुड़े तीन प्रमुख मामलों में कुल 8 आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके हैं।
अंत में जाते-जाते, अगर आपको कभी फोन या वीडियो कॉल पर कोई व्यक्ति पुलिस, CBI, ED, TRAI या किसी अन्य सरकारी संस्था का अधिकारी बनकर डराए और कहे कि आपको “डिजिटल अरेस्ट” किया गया है, तो सबसे पहले शांत रहें। किसी भी तरह का भुगतान करने से पहले स्वतंत्र रूप से सत्यापन करें। याद रखें—आपका डर ही साइबर ठगों का सबसे बड़ा हथियार है।
Disclaimer
इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न सार्वजनिक रूप से उपलब्ध समाचार रिपोर्टों और मीडिया स्रोतों के आधार पर तैयार की गई है। इसमें CBI की कार्रवाई, गिरफ्तारियों, साइबर अपराध और कथित Digital Arrest Scam से संबंधित जानकारी शामिल है।
लेख में किसी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोपों को अदालत द्वारा दोष सिद्ध किया हुआ नहीं माना जाना चाहिए। जांच जारी रहने के दौरान तथ्यों, आरोपों या गिरफ्तार आरोपियों की भूमिका में आगे बदलाव संभव है।
इस लेख का उद्देश्य पाठकों को साइबर अपराध और Digital Arrest Scam के प्रति जागरूक करना है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या जांच एजेंसी की छवि को नुकसान पहुंचाना नहीं है।
पाठकों को सलाह दी जाती है कि किसी भी महत्वपूर्ण कानूनी या वित्तीय निर्णय से पहले संबंधित आधिकारिक सरकारी एजेंसी अथवा प्रमाणित स्रोत से जानकारी की पुष्टि करें।
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