नेपाल से बाढ़ के बाद बिहार पहुंचीं ये विचित्र मछलियां, क्या हैं ये? 80 किलो तक के दावे और सरकारी चेतावनी की पूरी सच्चाई

नेपाल में आई भीषण बाढ़ के बाद बिहार की गंडक नदी और आसपास के इलाकों में बड़ी और असामान्य मछलियां मिलने की खबर ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। स्थानीय स्तर पर कई बड़ी मछलियां पकड़े जाने की जानकारी सामने आई है और कुछ रिपोर्टों में इनका वजन कई दर्जन किलो तक बताया गया है। इसी बीच सोशल मीडिया पर इन मछलियों को लेकर कई तरह के दावे भी वायरल हो रहे हैं—कहीं इन्हें “आदमखोर मछली” कहा जा रहा है तो कहीं 100 से 200 किलो तक की मछलियां मिलने का दावा किया जा रहा है।

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लेकिन असली सवाल यह है कि नेपाल की बाढ़ के बाद बिहार में आखिर कौन-सी मछलियां पहुंची हैं? क्या ये वास्तव में इंसानों को खा सकती हैं? क्या इन्हें खाना खतरनाक है? बिहार सरकार ने लोगों को इन्हें खाने और खरीदने-बेचने से क्यों बचने को कहा है?

इस ब्लॉग में हम इन सभी सवालों को विस्तार से समझेंगे और वायरल दावों तथा उपलब्ध रिपोर्टों के बीच का अंतर भी जानेंगे।


नेपाल की बाढ़ के बाद बिहार में क्यों पहुंचीं बड़ी मछलियां?

नेपाल और बिहार का भौगोलिक संबंध नदियों के माध्यम से बहुत मजबूत है। नेपाल से निकलने वाली कई नदियां बिहार में प्रवेश करती हैं और यहां की नदी व्यवस्था का हिस्सा बन जाती हैं। इनमें गंडक नदी भी महत्वपूर्ण है।

जब किसी क्षेत्र में अत्यधिक बारिश होती है और अचानक बाढ़ आती है, तो नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ जाता है। तेज बहाव के कारण नदी के किनारे मौजूद तालाब, जलाशय और दूसरे जलस्रोत भी प्रभावित हो सकते हैं।

ऐसी स्थिति में मछलियां अपने सामान्य जलक्षेत्र से निकलकर तेज बहाव के साथ दूसरे स्थानों तक पहुंच सकती हैं।

नेपाल में अगस्त 2026 के आखिर में आई बाढ़ के बाद बिहार के गंडक नदी क्षेत्र में बड़ी मछलियों के मिलने की खबरें सामने आईं। स्थानीय मछुआरों ने कुछ ऐसी मछलियां पकड़ीं जिनका आकार सामान्य बाजार में मिलने वाली मछलियों से काफी बड़ा था।

कुछ रिपोर्टों में 27 से 60 किलो तक की मछलियों का उल्लेख किया गया है, जबकि BBC की रिपोर्ट में स्थानीय स्तर पर 80 किलो से लेकर करीब एक क्विंटल तक वजन वाली मछलियों के दावे सामने आए हैं।

हालांकि सोशल मीडिया पर इससे भी अधिक वजन वाली मछलियों के वीडियो और तस्वीरें वायरल हैं, लेकिन हर वायरल दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि बाढ़ के बाद बिहार में असामान्य रूप से बड़ी मछलियां मिलने की घटनाएं सामने आई हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर बताए जा रहे हर वजन और हर प्रजाति की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है।


बिहार के किस इलाके में मिलीं ये बड़ी मछलियां?

इस पूरे मामले में बिहार का गोपालगंज और गंडक नदी क्षेत्र विशेष रूप से चर्चा में रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार, गोपालगंज के मंगलपुर घाट के आसपास मछुआरों को बाढ़ के बाद बड़ी मछलियां मिलीं। कुछ मछलियों का वजन 27 से 60 किलो तक बताया गया।

गंडक नदी का तेज बहाव और नेपाल में आई बाढ़ इस घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है।

बाढ़ के दौरान पानी का स्तर अचानक बढ़ने पर नदी में रहने वाली मछलियां भी अपने सामान्य स्थानों से दूर चली जाती हैं। इसके अलावा नेपाल के जलाशयों या नदी से जुड़े क्षेत्रों में रहने वाली मछलियां भी पानी के तेज बहाव के साथ नीचे की ओर आ सकती हैं।

यही कारण है कि बाढ़ के बाद किसी नदी में ऐसी मछलियों का मिलना पूरी तरह असंभव घटना नहीं है।


आखिर कौन-सी मछली है ये?

सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा गूंछ कैटफिश यानी Goonch Catfish को लेकर हो रही है।

इसे कई स्थानों पर स्थानीय नामों से भी जाना जाता है। वैज्ञानिक रूप से इसे Bagarius समूह की बड़ी कैटफिश से जोड़ा जाता है।

गूंछ एक freshwater catfish है और यह आकार में काफी बड़ी हो सकती है। इसका शरीर सामान्य रोहू, कतला या अन्य आम मछलियों से काफी अलग दिखाई देता है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।

बिहार में पकड़ी गई हर बड़ी मछली को गूंछ कहना सही नहीं है।

किसी मछली की तस्वीर देखकर उसकी प्रजाति की पक्की पहचान करना मुश्किल हो सकता है। इसके लिए विशेषज्ञों द्वारा वैज्ञानिक पहचान की जरूरत होती है।

रिपोर्टों में गूंछ के अलावा दूसरी बड़ी मछलियों का भी उल्लेख हुआ है। कुछ जगहों पर थाई मांगुर, बराली/Wallago Catfish, Grass Carp और Rohu जैसी मछलियों का भी जिक्र किया गया है।

इसलिए “नेपाल से सिर्फ आदमखोर गूंछ मछली ही बिहार आई है” कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।


क्या गूंछ मछली आदमखोर होती है?

यही सवाल इस खबर को सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा वायरल बना रहा है।

गूंछ मछली को लेकर लंबे समय से ऐसी कहानियां और रिपोर्टें मौजूद रही हैं जिनमें इसे इंसानों पर हमला करने वाली मछली के रूप में पेश किया गया है।

यह एक बड़ी शिकारी मछली है और अपने आकार के कारण निश्चित रूप से शक्तिशाली होती है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि गूंछ मछली पानी में मौजूद हर इंसान को खाने के लिए हमला करती है।

सोशल मीडिया पर “आदमखोर मछली”, “इंसानों को निगल जाएगी” या “बिहार में इंसानों के लिए खतरा” जैसे शीर्षक अक्सर खबर को ज्यादा सनसनीखेज बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

वर्तमान बिहार मामले में भी यह दावा करना उचित नहीं है कि वहां मिली सभी बड़ी मछलियां आदमखोर हैं।

इसके अलावा वायरल वीडियो में दिखाई देने वाली प्रत्येक मछली की प्रजाति की स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि भी नहीं हुई है।

इसलिए पाठकों को ऐसे दावों से सावधान रहना चाहिए।


क्या 100 या 200 किलो की मछली सच में मिली है?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सोशल मीडिया पर अलग-अलग वजन वाली मछलियों की तस्वीरें वायरल हो रही हैं।

कुछ स्थानीय रिपोर्टों में 27 से 60 किलो तक की मछलियों के पकड़े जाने की बात सामने आई है।

BBC की रिपोर्ट में स्थानीय स्तर पर 80 किलो से लेकर लगभग एक क्विंटल तक वजन वाली मछलियों का उल्लेख मिलता है।

लेकिन इसके साथ ही सोशल मीडिया पर 200 किलो तक की मछली के दावे भी देखने को मिले हैं।

यहां फर्क समझना जरूरी है।

किसी तस्वीर के साथ “200 किलो की मछली” लिखा होने से यह साबित नहीं हो जाता कि वह वास्तव में उसी स्थान पर, उसी समय और उसी वजन की मछली है।

वायरल तस्वीरों और वीडियो को कई बार पुराने घटनाक्रम के साथ भी शेयर किया जाता है।

इसलिए वर्तमान घटना के संदर्भ में सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यही है कि काफी बड़ी मछलियां पकड़े जाने की रिपोर्टें सामने आई हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल हर वजन के दावे की पुष्टि नहीं हुई है।


बिहार सरकार ने मछली खाने से क्यों किया सावधान?

इस खबर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा “आदमखोर मछली” नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा है।

बिहार सरकार ने नेपाल की बाढ़ के पानी के साथ आने वाली अज्ञात या असामान्य मछलियों को खाने, खरीदने और बेचने से बचने की सलाह दी है।

अब सवाल है कि अगर मछली जहरीली नहीं है तो फिर उसे खाने से मना क्यों किया गया?

इसका जवाब है—बाढ़ का पानी।

बाढ़ का पानी सामान्य नदी के पानी जैसा साफ और नियंत्रित नहीं होता।

बाढ़ के दौरान पानी अपने रास्ते में आने वाली कई तरह की चीजों को अपने साथ बहाकर ले जा सकता है।

इसमें शामिल हो सकते हैं:

  • सीवेज
  • नालियों का पानी
  • कचरा
  • मृत पशु
  • सड़ा हुआ जैविक पदार्थ
  • कृषि क्षेत्र से आने वाले प्रदूषक
  • बैक्टीरिया और दूसरे रोगजनक तत्व

अगर कोई मछली लंबे समय तक ऐसे दूषित पानी के संपर्क में रही है, तो उसके सेवन को लेकर खाद्य सुरक्षा की चिंता पैदा होना स्वाभाविक है।

यही वजह है कि सरकार की चेतावनी को “मछली जहरीली है” के रूप में नहीं समझना चाहिए।

सरकार का उद्देश्य लोगों को संभावित स्वास्थ्य जोखिम से बचाना है।


क्या बाढ़ के पानी में रहने वाली मछली खाने से बीमारी हो सकती है?

बाढ़ के बाद खाद्य पदार्थों के दूषित होने का खतरा बढ़ सकता है।

मछली यदि दूषित पानी में रही हो या उसे सही तरीके से संग्रहित, साफ और पकाया न गया हो तो खाद्य संक्रमण का जोखिम हो सकता है।

कुछ रिपोर्टों में ऐसी मछलियां खाने के बाद लोगों को उल्टी, दस्त और पेट दर्द जैसी समस्याएं होने की बात सामने आई है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति को ऐसी मछली खाने के बाद निश्चित रूप से बीमारी होगी।

इसी तरह यह भी कहना उचित नहीं है कि किसी व्यक्ति की बीमारी का कारण निश्चित रूप से वही मछली थी, जब तक चिकित्सकीय जांच और वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद न हों।

इसलिए यहां सबसे महत्वपूर्ण शब्द है—सावधानी।

जब प्रशासन या विशेषज्ञ किसी अज्ञात स्रोत से आई मछली को न खाने की सलाह दे रहे हों, तो उस सलाह का पालन करना ज्यादा सुरक्षित है।


क्या नेपाल से आई हर मछली खतरनाक है?

नहीं।

यह एक बहुत महत्वपूर्ण अंतर है।

खबर में “नेपाल की बाढ़ के बाद आई मछलियों” की बात हो रही है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि नेपाल की हर मछली जहरीली या खतरनाक है।

खतरा मुख्य रूप से इस बात से जुड़ा है कि मछली बाढ़ के दौरान किस पानी और किस वातावरण से होकर आई है।

एक सामान्य साफ जलाशय में पली मछली और प्रदूषित बाढ़ के पानी में बहकर आई मछली को खाद्य सुरक्षा के नजरिए से एक जैसा नहीं माना जा सकता।

इसीलिए अज्ञात स्रोत से मिली मछलियों से दूरी रखने की सलाह दी गई है।


क्या ये मछलियां बिहार के पर्यावरण के लिए भी खतरा बन सकती हैं?

अगर बाढ़ के साथ किसी क्षेत्र में ऐसी प्रजातियां पहुंचती हैं जो उस ecosystem की स्थानीय प्रजातियां नहीं हैं, तो यह एक अलग पर्यावरणीय चिंता हो सकती है।

इसे invasive species यानी आक्रामक/विदेशी प्रजाति के संदर्भ में देखा जाता है।

कुछ विदेशी मछलियां स्थानीय मछलियों के भोजन और आवास के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं। कुछ प्रजातियां स्थानीय aquatic ecosystem पर दबाव डाल सकती हैं।

रिपोर्टों में Thai Magur और अन्य कैटफिश जैसी प्रजातियों का भी उल्लेख हुआ है।

हालांकि वर्तमान मामले में मिली हर मछली को invasive species कहना भी सही नहीं होगा।

इसके लिए विशेषज्ञों द्वारा प्रजातियों की पहचान और नदी के ecosystem पर उनके प्रभाव का अध्ययन जरूरी है।


बाढ़ मछलियों को इतनी दूर कैसे ले जा सकती है?

यह सवाल सुनने में सामान्य लगता है लेकिन इसके पीछे एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक प्रक्रिया है।

मछलियां पानी के साथ बह सकती हैं, खासकर तब जब नदी का प्रवाह असामान्य रूप से तेज हो।

बाढ़ के दौरान:

तालाब → नाला → नदी → मुख्य नदी तंत्र

जैसा प्राकृतिक जल संपर्क बन सकता है।

यदि किसी तालाब या छोटे जलाशय का पानी नदी से जुड़ जाता है तो उसमें मौजूद मछलियां भी बाहर निकल सकती हैं।

इसी तरह नदी में पहले से मौजूद मछलियां तेज धारा के साथ काफी नीचे तक जा सकती हैं।

इसलिए नेपाल में बाढ़ आने के बाद बिहार की नदियों में अलग-अलग आकार और प्रजातियों की मछलियों का पहुंचना प्राकृतिक रूप से संभव है।


स्थानीय मछुआरों के लिए यह घटना क्यों महत्वपूर्ण है?

मछली पकड़ना बिहार के कई नदी क्षेत्रों में लोगों की आजीविका से जुड़ा हुआ है।

जब बाढ़ के बाद बड़ी मछलियां नदी में दिखाई देती हैं तो मछुआरों के लिए यह आकर्षक अवसर भी बन सकता है।

कुछ लोगों ने ऐसी मछलियों को पकड़ा और स्थानीय बाजारों में बेचने की कोशिश की।

लेकिन यही वह जगह है जहां स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी महत्वपूर्ण हो जाती है।

अगर मछली का स्रोत संदिग्ध है और वह बाढ़ के दूषित पानी से आई है तो सिर्फ उसके बड़े आकार या ऊंची कीमत के कारण उसे बाजार में बेचने या खाने का फैसला करना सुरक्षित नहीं माना जा सकता।

सरकार की advisory का उद्देश्य इसी जोखिम को कम करना है।


क्या बड़ी मछली का मतलब ज्यादा खतरनाक मछली है?

जरूरी नहीं।

मछली का आकार और उसका स्वास्थ्य जोखिम दो अलग-अलग चीजें हैं।

एक बड़ी मछली सामान्य और सुरक्षित प्रजाति की हो सकती है, जबकि छोटी मछली भी दूषित पानी के कारण स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकती है।

इसी तरह किसी मछली का बड़ा मुंह या डरावना चेहरा देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि वह इंसानों के लिए खतरनाक है।

इसलिए इस घटना को समझते समय आकार, प्रजाति और दूषण—इन तीनों को अलग-अलग देखना जरूरी है।


सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो से क्यों सावधान रहें?

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर कई तस्वीरें और वीडियो तेजी से वायरल हुए।

कुछ वीडियो में बहुत बड़ी मछलियां दिखाई जा रही हैं और उनके साथ दावा किया जा रहा है कि ये सभी नेपाल की बाढ़ के बाद बिहार पहुंची हैं।

लेकिन किसी भी वायरल पोस्ट को सच मानने से पहले कुछ सवाल पूछना चाहिए:

  1. वीडियो कब का है?
  2. वीडियो किस जगह का है?
  3. मछली की प्रजाति क्या है?
  4. वजन किसने मापा?
  5. क्या किसी सरकारी या वैज्ञानिक स्रोत ने इसकी पुष्टि की है?
  6. क्या वीडियो वास्तव में वर्तमान बाढ़ से संबंधित है?

इन सवालों के जवाब नहीं मिलने पर वायरल दावे को तथ्य मानना उचित नहीं है।


क्या इन मछलियों से डरकर नदी में जाना बंद कर देना चाहिए?

घटना को लेकर अनावश्यक डर पैदा करने की जरूरत नहीं है।

बाढ़ के समय नदी और तेज बहाव वाले जलक्षेत्रों से वैसे भी दूरी रखना जरूरी होता है क्योंकि वहां डूबने, तेज धारा, मलबे और अन्य खतरों का जोखिम रहता है।

इसके अलावा किसी बड़ी मछली के दिखाई देने का मतलब यह नहीं है कि वह इंसानों पर हमला करेगी।

लेकिन यदि प्रशासन ने किसी विशेष जलक्षेत्र से दूरी रखने या वहां से पकड़ी गई मछलियों का सेवन न करने की सलाह दी है, तो उसका पालन करना चाहिए।


इस खबर की सबसे बड़ी सच्चाई क्या है?

पूरे मामले को अगर बेहद सरल भाषा में समझें तो कहानी कुछ इस तरह है:

नेपाल में भारी बारिश और बाढ़ आई।

बाढ़ और तेज जलप्रवाह के कारण अलग-अलग जलक्षेत्रों की मछलियां अपने सामान्य स्थानों से बाहर निकल सकती हैं।

गंडक नदी और बिहार के कुछ इलाकों में इसके बाद बड़ी और असामान्य मछलियां पकड़ी गईं।

कुछ रिपोर्टों में इनका वजन कई दर्जन किलो बताया गया और कुछ स्थानीय दावों में इससे भी ज्यादा वजन की मछलियों का उल्लेख हुआ।

इनमें से कुछ को गूंछ कैटफिश बताया गया, लेकिन हर मछली की प्रजाति की पुष्टि नहीं हुई।

सोशल मीडिया ने इनमें से कुछ मछलियों को “आदमखोर” और “खतरनाक” बताकर प्रचारित किया।

वहीं बिहार सरकार ने लोगों को ऐसी अज्ञात या बाढ़ में आई मछलियों को खाने, खरीदने और बेचने से बचने की सलाह दी।

इस चेतावनी का मुख्य कारण बाढ़ के पानी से संभावित contamination और खाद्य सुरक्षा है।

यही इस पूरी खबर का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है।


Fact Check: क्या सही और क्या गलत?

दावा: नेपाल से बड़ी मछलियां बिहार पहुंची हैं

सही।

बिहार के गंडक क्षेत्र में बड़ी मछलियां पकड़े जाने की रिपोर्ट सामने आई है।

दावा: सभी मछलियां गूंछ हैं

पुष्ट नहीं।

अलग-अलग रिपोर्टों में कई प्रजातियों का उल्लेख हुआ है।

दावा: सभी मछलियां आदमखोर हैं

गलत/भ्रामक।

हर बड़ी मछली को आदमखोर कहना उचित नहीं है।

दावा: 200 किलो की मछली निश्चित रूप से पकड़ी गई

पुष्ट नहीं।

ऐसे वायरल दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

दावा: बिहार सरकार ने सावधानी बरतने को कहा

सही।

बाढ़ के पानी के साथ आई अज्ञात/असामान्य मछलियों को खाने और खरीदने-बेचने से बचने की सलाह दी गई है।

दावा: इन मछलियों को खाना स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरा हो सकता है

सही।

बाढ़ के दूषित पानी के संपर्क में रहने के कारण खाद्य सुरक्षा का जोखिम हो सकता है।


लोगों को क्या सावधानी रखनी चाहिए?

यदि आपके इलाके में बाढ़ के बाद कोई असामान्य या बहुत बड़ी मछली मिलती है तो उसे केवल इसलिए घर लाकर न खाएं कि वह बड़ी है या स्वादिष्ट लग रही है।

खास तौर पर:

  • अज्ञात स्रोत की मछली खरीदने से बचें।
  • बाढ़ के पानी से पकड़ी गई मछली का सेवन न करें।
  • सोशल मीडिया पर वायरल दावों के आधार पर मछली की पहचान न करें।
  • स्थानीय प्रशासन या मत्स्य विभाग की सलाह का पालन करें।
  • यदि ऐसी मछली खाने के बाद उल्टी, दस्त, पेट दर्द या अन्य गंभीर समस्या हो तो चिकित्सकीय सलाह लें।
  • बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में साफ पानी और भोजन की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें।

निष्कर्ष: डर नहीं, सावधानी जरूरी है

नेपाल की बाढ़ के बाद बिहार में बड़ी और असामान्य मछलियों के मिलने की खबर निश्चित रूप से दिलचस्प है। गंडक नदी क्षेत्र में स्थानीय मछुआरों द्वारा बड़ी मछलियां पकड़े जाने की रिपोर्ट सामने आई है और कुछ रिपोर्टों में इनका वजन कई दर्जन किलो से लेकर करीब एक क्विंटल तक बताया गया है।

लेकिन इस खबर को सोशल मीडिया की तरह “बिहार में आदमखोर मछलियों का हमला” कहना सही नहीं होगा।

गूंछ कैटफिश एक बड़ी शिकारी मछली है, लेकिन वर्तमान घटना में मिली हर मछली को गूंछ या आदमखोर कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।

इसी तरह 100 या 200 किलो के हर वायरल दावे को भी सत्य नहीं माना जा सकता।

सबसे महत्वपूर्ण बात बिहार सरकार की स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी है। बाढ़ का पानी कई तरह के प्रदूषकों और रोगजनकों को अपने साथ ला सकता है। इसलिए बाढ़ के पानी से बहकर आई अज्ञात मछलियों को खाने से बचना एक समझदारी भरा कदम है।

इस पूरे मामले में सबसे सही संदेश यही है:

“बड़ी मछली देखकर उत्साहित होने के बजाय उसकी पहचान और सुरक्षा की पुष्टि जरूरी है।”

नेपाल की बाढ़ के बाद बिहार पहुंची इन विचित्र मछलियों की कहानी में सनसनी से ज्यादा महत्वपूर्ण है बाढ़, नदी का प्राकृतिक प्रवाह, मछलियों का विस्थापन और खाद्य सुरक्षा।

अगर आपके आसपास भी बाढ़ के बाद कोई ऐसी बड़ी या असामान्य मछली दिखाई देती है, तो उसे हाथ लगाने या खाने से पहले स्थानीय प्रशासन या मत्स्य विभाग की सलाह जरूर लें।


महत्वपूर्ण डिस्क्लेमर

इस लेख में उपलब्ध समाचार रिपोर्टों और सार्वजनिक रूप से सामने आई जानकारी के आधार पर घटना को समझाया गया है। सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों, वीडियो और मछलियों के वजन से जुड़े सभी दावों की स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या के लिए योग्य चिकित्सक की सलाह लें।

अंत में जाते-जाते

नेपाल की बाढ़ के बाद बिहार में बड़ी मछलियों का मिलना प्राकृतिक रूप से संभव घटना है, लेकिन इसे लेकर सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही हर बात सच नहीं मानी जा सकती। खासकर “आदमखोर”, “200 किलो की मछली” और “जहरीली मछली” जैसे दावों को बिना प्रमाण के आगे बढ़ाना गलत होगा।

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जय महादेव।

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